विपरीत सेक्स में भाईचंद पटेल की शुरू से दिलचस्पी थी, शायद कुछ ज़रूरत से ज़्यादा ही.
जब वो पचास के दशक में दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स में पढ़ रहे थे तो उनको सबसे बड़ा मलाल था कि उनके पूरे कॉलेज में 800 लड़कों के बीच सिर्फ़ एक लड़की पढ़ती थी. तब लड़कियों को 'डेट' पर ले जाना तो दूर उनका हाथ पकड़ना भी बहुत बड़ा 'स्कैंडल' माना जाता था.
लड़कों के हॉस्टल में लड़कियों का आना लगभग असंभव था. भाईचंद ने लड़कियों की कमी की भरपाई की जब वो लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में पढ़ने लंदन गए.
उन दिनों का वर्णन करते हुए 'आई एम अ स्ट्रेंजर हियर माईसेल्फ़' के लेखक भाई चंद पटेल बताते हैं, "एलएसई की लड़कियां वर्किंग क्लास से आती थीं. वो अपने मेक- अप और कपड़ों पर कुछ ख़ास ध्यान नहीं देती थीं और शायद हफ़्ते में एक बार नहाती थीं. लेकिन जब मैं इनर टैंपिल में क़ानून पढ़ने गया तो मुझे लगा जैसे किसी बच्चे को कैंडी स्टोर में छोड़ दिया गया हो. उस ज़माने में ब्रिटेन में नस्लवाद अपने चरम पर था. लेकिन तब भी इन लड़कियों की माओं को हम जैसे काले लड़कों से इनके मिलने पर कोई आपत्ति नहीं थीं बशर्ते वो गर्भवती नहीं होतीं या हम जैसों से इश्क़ न कर बैठतीं."
भाई चंद पटेल की बेबाकी का नमूना देखिए कि वो स्वीकार करते हैं कि, "उन दिनों हम लोग अपने बटुए में कंडोम रखा करते थे. पता नहीं कब इसकी ज़रूरत पड़ जाए. लेकिन सबसे बड़ी हिम्मत का काम होता था 'बूट्स' की दुकान के काउंटर पर जाकर महिला सेल्स गर्ल से कंडोम का पैकेट माँगना. और वो उन दिनों सस्ता भी नहीं आता था."
"हम जैसे छात्रों की जेब की पहुंच से बाहर की चीज़ थी. मज़े की बात ये थी कि हमारे साथ पढ़ने वाली भारतीय और पाकिस्तानी लड़कियों को हम में कोई दिलचस्पी नहीं थी जबकि हम लोग उनके साथ के लिए मरे जाते थे. वो गोरों के साथ घूमती थीं लेकिन दिलचस्प बात ये थी कि जब वो अपने देश लौटीं तो उन्होंने हम जैसे लोगों से ही शादियाँ कीं."
प्रशांत महासागर के एक छोटे से देश फ़िजी से अपनी ज़िदगी की शुरुआत करने वाले भाईचंद पटेल को कई प्रधानमंत्रियों, महारानियों, अभिनेत्रियों, हसीन औरतों और दिलचस्प लोगों से मिलने का मौक़ा मिला है. लेखक, पत्रकार और फ़िल्म समालोचक भाईचंद पटेल वकील रह चुके हैं.
उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में एक बड़े पद पर काम किया है. वो इस समय दिल्ली के चोटी के 'सोशेलाइट' हैं और उनकी दी गई दावतों में शामिल होने के लिए दिल्ली के सभ्राँत लोगों में होड़ लगी रहती है.
मुंबई, लंदन, न्यूयॉर्क, मनीला और काहिरा में रह चुके भाईचंद पटेल पिछले लगभग 20 सालों से दिल्ली में रह रहे हैं, लेकिन उन्होंने अभी भी अपनी फ़िजी की नागरिकता बरकरार रखी है.
भाईचंद पटेल बताते हैं, "मैं छोटी उम्र में आया था भारत पढ़ने फ़िजी सरकार की स्कॉलरशिप पर. फिर मैं लंदन पढ़ने गया. पांच साल वहां रहा. सोचा वहीं रह जाऊँ. मैंने तभी तय किया कि मैं फ़िजी का नागरिक हूँ, फ़िजी का ही नागरिक रहूंगा. मैं शायद वहाँ रह नहीं पाऊँगा, क्योंकि वो छोटी सी जगह है. वहाँ की आबादी दस लाख से भी कम है."
"लेकिन अब भी मैं हर दूसरे साल वहाँ जाता हूँ. मेरी छोटी बहन अब भी वहाँ रहती है. एक बार कोई फ़िजी जाए तो उसे भूल नहीं सकता. बहुत साफ़ सुथरी जगह है. वहाँ के लोग बहुत ज़िंदादिल हैं. मैं फ़िजी में ही बड़ा हुआ हूँ. हिंदी मैं समझता ज़रूर हूँ. लेकिन हिंदी मेरी मातृ भाषा नहीं है. मेरी भाषा भोजपुरी है. मेरे माता-पिता दोनों गुजरात से आते थे. लेकिन मैं उनसे भी भोजपुरी में बात करता था."
Tuesday, November 12, 2019
Thursday, October 31, 2019
कश्मीर में आज से क्या-क्या बदल जाएगा
पाँच अगस्त को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35ए हटाए जाने के बाद आज यानी 31 अक्टूबर से जम्मू-कश्मीर की कई चीज़ें इतिहास बन जाएंगी.
अनुच्छेद 370 और 35ए भारत के 30 राज्यों में से जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देते थे.
इनके हटने के साथ ही राज्य को प्राप्त विशेष दर्जा ख़त्म हो गया है.
साथ ही राज्य को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख दो हिस्सों में बाँटकर दोनों को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था, जो व्यवस्था आज से लागू हो रही है.
65 सालों से जम्मू और कश्मीर भारत के अंतर्गत ही एक स्वायत्त राज्य था. इसके कारण उसका अलग प्रशासन था और अलग वित्तीय, क़ानूनी प्रणाली थी जो राज्य से बाहर के लोगों को वहां की ज़मीन या संपत्ति ख़रीदने से रोकती थी.
साथ ही सभी सरकारी प्रतिष्ठानों और गाड़ियों में राज्य का एक लाल झंडा (तीन सफ़ेद पट्टियों और हल के निशान वाला) भारतीय तिरंगे के साथ लगा रहता था.
मोदी सरकार का मानना है कि ऐसे संवैधानिक प्रावधान न सिर्फ़ जम्मू-कश्मीर को एक पर्यटन और निवेश स्थल के तौर पर विकसित होने में रुकावट पैदा कर रहे हैं बल्कि अलगाववादी भावना को भी भड़का रहे हैं. इसके साथ ही पाकिस्तान को छद्म युद्ध के ज़रिए इन भावनाओं के इस्तेमाल का मौक़ा भी दे रहे हैं.
इस साल पाँच अगस्त को संसद में एक प्रस्ताव के ज़रिए इन प्रावधानों को ख़त्म कर दिया गया और अब राज्य दो केंद्र शासित प्रदेशों में बँट चुका है.
अब वो लाल झंडा नहीं लगेगा सिर्फ़ भारतीय तिरंगा ही रहेगा. लेकिन सवाल अब भी वहीं है कि क्या ये फ़ैसला भारत प्रशासित कश्मीर की समस्या को हमेशा के लिए सुलझा देगा? साथ ही अब जम्मू-कश्मीर में क्या-क्या बदलेगा.
भारत के किसी भी राज्य को कभी केंद्र शासित प्रदेश नहीं बनाया गया है, हालांकि कुछ भारतीय राज्यों को विभाजित किया गया है.
बिहार से झारखंड बना, उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड बना और आंध्र प्रदेश से तेलंगाना बनाया गया. ये सभी क्षेत्रीय बदलाव लोगों की मांग के बाद किए गए और स्थानीय विधायिका की सहमति से इन्हें लागू किया गया.
श्रीनगर हाई कोर्ट में वरिष्ठ वक़ील और संविधान विशेषज्ञ रियाज़ खवार कहते हैं, ''संघीय भारत में जम्मू-कश्मीर ऐसा पहला राज्य है जिसे स्थानीय विधायिका की सहमति के बिना दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट दिया गया. अब लद्दाख बिना विधानसभा वाला और जम्मू-कश्मीर पुडुचेरी की तरह विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश होगा. जो नए बदलाव होंगे लोगों को अभी उन्हें पूरी तरह से समझना बाक़ी है.''
रियाज़ खवार कहते हैं कि नई व्यवस्था में राज्य के 420 स्थानीय क़ानूनों में से केवल 136 को ही बरकरार रखा गया है.
उन्होंने बताया, ''हर जगह क़ानून एक जैसे हैं. हमारे पास ज़्यादा बेहतर क़ानून थे. उदाहरण के लिए वक्फ़ अधिनियम, जो मुस्लिम धर्मस्थलों की आय को मौलवियों के साथ बाँटने की अनुमति नहीं देता है. लेकिन केंद्रीय वक्फ़ अधिनियम अलग है. यह मौलवी को एक हितधारक के तौर पर देखता है.''
एक कॉलेजिएट और लेखक क़ुरत रहबर के लिए ये परिवर्तन बहुत उलझन भरे हैं.
क़ुरत रहबर का कहना है, ''हम सिर्फ़ ये जानते हैं कि अब हम वो नहीं हैं जो 31 अक्टूबर से पहले थे. मुझे ज़्यादा जानकारी नहीं है लेकिन मुझे ये लगता है कि हम लोगों का अपमान हुआ है और हमारे पास जो भी क़ानूनी और राजनीतिक ताक़त थी वो अब नहीं रहेगी.''
अनुच्छेद 370 और 35ए भारत के 30 राज्यों में से जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देते थे.
इनके हटने के साथ ही राज्य को प्राप्त विशेष दर्जा ख़त्म हो गया है.
साथ ही राज्य को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख दो हिस्सों में बाँटकर दोनों को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था, जो व्यवस्था आज से लागू हो रही है.
65 सालों से जम्मू और कश्मीर भारत के अंतर्गत ही एक स्वायत्त राज्य था. इसके कारण उसका अलग प्रशासन था और अलग वित्तीय, क़ानूनी प्रणाली थी जो राज्य से बाहर के लोगों को वहां की ज़मीन या संपत्ति ख़रीदने से रोकती थी.
साथ ही सभी सरकारी प्रतिष्ठानों और गाड़ियों में राज्य का एक लाल झंडा (तीन सफ़ेद पट्टियों और हल के निशान वाला) भारतीय तिरंगे के साथ लगा रहता था.
मोदी सरकार का मानना है कि ऐसे संवैधानिक प्रावधान न सिर्फ़ जम्मू-कश्मीर को एक पर्यटन और निवेश स्थल के तौर पर विकसित होने में रुकावट पैदा कर रहे हैं बल्कि अलगाववादी भावना को भी भड़का रहे हैं. इसके साथ ही पाकिस्तान को छद्म युद्ध के ज़रिए इन भावनाओं के इस्तेमाल का मौक़ा भी दे रहे हैं.
इस साल पाँच अगस्त को संसद में एक प्रस्ताव के ज़रिए इन प्रावधानों को ख़त्म कर दिया गया और अब राज्य दो केंद्र शासित प्रदेशों में बँट चुका है.
अब वो लाल झंडा नहीं लगेगा सिर्फ़ भारतीय तिरंगा ही रहेगा. लेकिन सवाल अब भी वहीं है कि क्या ये फ़ैसला भारत प्रशासित कश्मीर की समस्या को हमेशा के लिए सुलझा देगा? साथ ही अब जम्मू-कश्मीर में क्या-क्या बदलेगा.
भारत के किसी भी राज्य को कभी केंद्र शासित प्रदेश नहीं बनाया गया है, हालांकि कुछ भारतीय राज्यों को विभाजित किया गया है.
बिहार से झारखंड बना, उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड बना और आंध्र प्रदेश से तेलंगाना बनाया गया. ये सभी क्षेत्रीय बदलाव लोगों की मांग के बाद किए गए और स्थानीय विधायिका की सहमति से इन्हें लागू किया गया.
श्रीनगर हाई कोर्ट में वरिष्ठ वक़ील और संविधान विशेषज्ञ रियाज़ खवार कहते हैं, ''संघीय भारत में जम्मू-कश्मीर ऐसा पहला राज्य है जिसे स्थानीय विधायिका की सहमति के बिना दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट दिया गया. अब लद्दाख बिना विधानसभा वाला और जम्मू-कश्मीर पुडुचेरी की तरह विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश होगा. जो नए बदलाव होंगे लोगों को अभी उन्हें पूरी तरह से समझना बाक़ी है.''
रियाज़ खवार कहते हैं कि नई व्यवस्था में राज्य के 420 स्थानीय क़ानूनों में से केवल 136 को ही बरकरार रखा गया है.
उन्होंने बताया, ''हर जगह क़ानून एक जैसे हैं. हमारे पास ज़्यादा बेहतर क़ानून थे. उदाहरण के लिए वक्फ़ अधिनियम, जो मुस्लिम धर्मस्थलों की आय को मौलवियों के साथ बाँटने की अनुमति नहीं देता है. लेकिन केंद्रीय वक्फ़ अधिनियम अलग है. यह मौलवी को एक हितधारक के तौर पर देखता है.''
एक कॉलेजिएट और लेखक क़ुरत रहबर के लिए ये परिवर्तन बहुत उलझन भरे हैं.
क़ुरत रहबर का कहना है, ''हम सिर्फ़ ये जानते हैं कि अब हम वो नहीं हैं जो 31 अक्टूबर से पहले थे. मुझे ज़्यादा जानकारी नहीं है लेकिन मुझे ये लगता है कि हम लोगों का अपमान हुआ है और हमारे पास जो भी क़ानूनी और राजनीतिक ताक़त थी वो अब नहीं रहेगी.''
Tuesday, September 17, 2019
Черноморский флот взял на сопровождение корабль ВМС США "Юма"
В акваторию Черного моря зашел экспедиционный транспортный корабль Военно-морских сил США "Юма". Черноморский флот взял судно на сопровождение.
Сначала о зашедшем в Черное море быстроходном военно-транспортном судне сообщил ресурс Bosphorus Observer, который отслеживает прохождение судов через пролив Босфор. Затем Национальный центр управления обороной России сообщил, что "Юма" взят на сопровождение.
"Назначенными дежурными силами и средствами Черноморского флота осуществляется непрерывное слежение за американским судном", - говорится в сообщении. Там добавили, что корабль зашел в акваторию Черного моря в субботу 14 сентября около 17:30 по московскому времени.
Отмечается, что этот корабль, относящийся к высокоскоростным многоцелевым судам класса Spearhead, уже в третий раз за год заходит в Черное море, его цели неизвестны.
Судна такого класса предназначены для оперативной переброски войск, грузов, военной техники, снабжения, а также могут проводить гуманитарные спасательные операции. На вооружении этого судна - четыре крупнокалиберных пулемета M2. На корабле есть летная палуба для вертолета.
В августе в Черное море заходил американский эсминец USS Porter - боевой корабль, вооруженный крылатыми ракетами. Его также сопровождал российский Черноморский флот.
Сначала о зашедшем в Черное море быстроходном военно-транспортном судне сообщил ресурс Bosphorus Observer, который отслеживает прохождение судов через пролив Босфор. Затем Национальный центр управления обороной России сообщил, что "Юма" взят на сопровождение.
"Назначенными дежурными силами и средствами Черноморского флота осуществляется непрерывное слежение за американским судном", - говорится в сообщении. Там добавили, что корабль зашел в акваторию Черного моря в субботу 14 сентября около 17:30 по московскому времени.
Отмечается, что этот корабль, относящийся к высокоскоростным многоцелевым судам класса Spearhead, уже в третий раз за год заходит в Черное море, его цели неизвестны.
Судна такого класса предназначены для оперативной переброски войск, грузов, военной техники, снабжения, а также могут проводить гуманитарные спасательные операции. На вооружении этого судна - четыре крупнокалиберных пулемета M2. На корабле есть летная палуба для вертолета.
В августе в Черное море заходил американский эсминец USS Porter - боевой корабль, вооруженный крылатыми ракетами. Его также сопровождал российский Черноморский флот.
Wednesday, August 28, 2019
Владивосток затопило. Дожди будут идти до конца лета
С начала недели в Приморском крае продолжаются дожди, больше всего осадков выпало во Владивостоке. Обильные дожди привели к подтоплениям на дорогах и улицах города, сбоям в работе общественного транспорта и сходу селей.
Дожди обрушились на Приморье в ночь на вторник, минувшей ночью они вновь прошли на большой территории края.
"Во Владивостоке наблюдался очень сильный дождь с количеством осадков от 59 мм до 78 мм. Сегодня в южной половине края и на северо-западе пройдут сильные дожди (до 49 мм), местами очень сильные, с количеством [осадков] свыше 50 мм", - сообщает приморский гидрометцентр.
Многие дороги во Владивостоке оказались под водой, в городе продолжают сходить сели. Ночью на участок дороги на Командорской улице сель сошел уже второй раз за сутки, сообщили ТАСС в пресс-службе мэрии.
На участке железной дороги Гвоздево - Барановский из-за схода селевых масс и подтопления путей закрыто движение поездов. "Причиной послужили сильнейшие тропические ливни", - сообщает Дальневосточная железная дорога.
Из-за ливней в городе произошло аварийное отключение двух подстанций, в результате несколько улиц, где расположены многоэтажные дома, остались без света, сообщил РИА Новости представитель мэрии.
В среду из-за подтоплений был ограничен въезд и выезд транспорта с территории аэропорта Владивостока. Подтопленной оказалась территория привокзальной площади аэропорта, в том числе и парковка для автотранспорта.
По состоянию на 09:00 по Москве ограничения на въезд автотранспорта на территорию аэропорта Владивостока были сняты, сообщает управление МВД по Приморскому краю.
Дожди обрушились на Приморье в ночь на вторник, минувшей ночью они вновь прошли на большой территории края.
"Во Владивостоке наблюдался очень сильный дождь с количеством осадков от 59 мм до 78 мм. Сегодня в южной половине края и на северо-западе пройдут сильные дожди (до 49 мм), местами очень сильные, с количеством [осадков] свыше 50 мм", - сообщает приморский гидрометцентр.
Многие дороги во Владивостоке оказались под водой, в городе продолжают сходить сели. Ночью на участок дороги на Командорской улице сель сошел уже второй раз за сутки, сообщили ТАСС в пресс-службе мэрии.
На участке железной дороги Гвоздево - Барановский из-за схода селевых масс и подтопления путей закрыто движение поездов. "Причиной послужили сильнейшие тропические ливни", - сообщает Дальневосточная железная дорога.
Из-за ливней в городе произошло аварийное отключение двух подстанций, в результате несколько улиц, где расположены многоэтажные дома, остались без света, сообщил РИА Новости представитель мэрии.
В среду из-за подтоплений был ограничен въезд и выезд транспорта с территории аэропорта Владивостока. Подтопленной оказалась территория привокзальной площади аэропорта, в том числе и парковка для автотранспорта.
По состоянию на 09:00 по Москве ограничения на въезд автотранспорта на территорию аэропорта Владивостока были сняты, сообщает управление МВД по Приморскому краю.
Tuesday, August 20, 2019
英国女性自诉:我在产房目睹的那些秘密
我做这个工作已经15年了,从我手中接生的新生宝宝大约有数千名,我真的都记不清了。
没有任何事情能跟见证一个新生命第一声啼哭,以及初为父母的人第一次见到他们孩子时眼中的目光更令人感动的了。
比如,有些剖腹产产妇在孩子出生后,会把自己阴道分泌物摸到新生儿的脸上和嘴上。她们相信这样做,会增加孩子未来的抵抗力和抗过敏能力等。
有些产妇希望保留自己的胎盘,把它制成药丸,或是把它埋到家里的花园树下,作为一种出生纪念。
生产过程中,孕妇及家属的种种反应包括痛苦、挣扎、嚎叫、歇斯底里等等对我来说都是家常便饭。
有些产妇由于产道扩张或用力过猛,造成大小便失禁,弄脏了床单。为了不让产妇尴尬,我都尽量在她们发觉前,就偷偷地清理干净。
当助产士不但要协助产妇生产,还要帮助和应付一些难缠的家属。
这里需要许多技巧。 产房有时就像“战场”,你必须有化干戈为玉帛的智慧。因为焦躁和紧张压力会导致人们各种各样的情感大爆发。
比如,我每周工作3到4天,每天正常工作时间为12个小时,而且不分昼夜。赶上难产或是人手不足,超忙的时候, 一个班可能要上15个小时或是更长。
可以想象,你不能把工作做了一半,到点走人。
有时回到家,我全身就像散架了一样,极其疲惫。
不仅如此,工作压力对我情感上的冲击更大。有时我回到家,真的是泪眼汪汪,第二天真不想再去上班了。
而我最大的担心是由于睡眠不足可能会导致工作中出错,比如给人用错药或用错量等。
这也是干我们这一行的共同担忧。由于每天忙于工作,我根本无暇顾及自己的饮食是否健康。
这一点很具讽刺意味。因为我是医护人员,按道理应该懂得健康饮食。
但事实上,为了应对繁忙的工作。我们经常靠加糖饮料来提供能量,支撑一天。
更糟糕的是,有一天我什么都没吃,只靠几罐可乐和巧克力干完一天的活。
我现在自己也在休产假。我真的考虑过不干了。休产假给了我一个小憩的空间,让我从工作的压力中抽身出来。
没有任何事情能跟见证一个新生命第一声啼哭,以及初为父母的人第一次见到他们孩子时眼中的目光更令人感动的了。
比如,有些剖腹产产妇在孩子出生后,会把自己阴道分泌物摸到新生儿的脸上和嘴上。她们相信这样做,会增加孩子未来的抵抗力和抗过敏能力等。
有些产妇希望保留自己的胎盘,把它制成药丸,或是把它埋到家里的花园树下,作为一种出生纪念。
生产过程中,孕妇及家属的种种反应包括痛苦、挣扎、嚎叫、歇斯底里等等对我来说都是家常便饭。
有些产妇由于产道扩张或用力过猛,造成大小便失禁,弄脏了床单。为了不让产妇尴尬,我都尽量在她们发觉前,就偷偷地清理干净。
当助产士不但要协助产妇生产,还要帮助和应付一些难缠的家属。
这里需要许多技巧。 产房有时就像“战场”,你必须有化干戈为玉帛的智慧。因为焦躁和紧张压力会导致人们各种各样的情感大爆发。
比如,我每周工作3到4天,每天正常工作时间为12个小时,而且不分昼夜。赶上难产或是人手不足,超忙的时候, 一个班可能要上15个小时或是更长。
可以想象,你不能把工作做了一半,到点走人。
有时回到家,我全身就像散架了一样,极其疲惫。
不仅如此,工作压力对我情感上的冲击更大。有时我回到家,真的是泪眼汪汪,第二天真不想再去上班了。
而我最大的担心是由于睡眠不足可能会导致工作中出错,比如给人用错药或用错量等。
这也是干我们这一行的共同担忧。由于每天忙于工作,我根本无暇顾及自己的饮食是否健康。
这一点很具讽刺意味。因为我是医护人员,按道理应该懂得健康饮食。
但事实上,为了应对繁忙的工作。我们经常靠加糖饮料来提供能量,支撑一天。
更糟糕的是,有一天我什么都没吃,只靠几罐可乐和巧克力干完一天的活。
我现在自己也在休产假。我真的考虑过不干了。休产假给了我一个小憩的空间,让我从工作的压力中抽身出来。
Wednesday, July 31, 2019
香港抗议:“不合作运动”在争议中进行
香港反对《逃犯条例》修订的后续示威浪潮持续,更有市民在网上组织发起“不合作运动”,在多个地铁车站阻碍车门关闭,令列车无法开出。
香港铁路公司(简称“港铁”)周二(7月30日)早上发出通知,收到多宗报告指乘客阻碍车门关闭和按动月台上的紧急按钮,令列车无法正常运作,上班族的行程受阻。其中穿越重要工商业地区的观塘线和港岛线更一度暂停部份服务。
就在前一天,中国国务院港澳事务办公室召开记者会,重申北京政府支持香港政府和特首林郑月娥的施政,又希望香港社会尽快走出政治纷争,集中精力发展经济、改善民生。
林郑月娥上月宣布暂缓《逃犯条例》修订,之后更形容修例工作已经“寿终正寝”,但示威者仍然坚持她要正式撤回修例建议,同时成立独立委员会,调查风波中警察滥用权力等指控,香港各处多次抗议中爆发严重警民冲突。
以年轻人为主导的网络讨论区,许多留言对“不合作运动”的评价正面,但上班族和舆论对这次行动的反应呈两极。反对者批评行动影响普通市民,会造成反效果;支持一方认为政府必须积极回应示威者的要求,才能平息风波。
香港警察早上差不多8时接到报告有人在市区观塘线一个车站阻碍列车车门关上,警察到场处理,一些乘客与参加“不合作运动”的人吵架,发生推撞。港铁最后宣布暂停观塘线部份服务,安排接驳公车接载乘客。
BBC中文记者现场观察所见,最高峰时期观塘有过百名乘客轮候接驳公车,秩序良好,但当区路面交通同时挤塞,成功登车的乘客仍然被困路上。不计算轮候接驳公车的时间,原本乘坐地铁只须五分钟的车程变成至少半小时。
乘客对运动的反应两极,一些认为香港政府应尽快回应示威者的要求,包括成立独立委员会调查警察滥权、怀疑黑社会份子早前在元朗车站无差别袭击途人的事件,和正式撤回《逃犯条例》修订,香港社会才会回复平静;但也有乘客认为示威者表达意见的时候不应影响其他人。
港铁在早上差不多11时再宣布,港岛线有类似情况发生,暂停那条路线的部份服务,又派出职员在车站外要求乘客乘坐其他交通工具,附近的公车站、计程车站和电车站有许多市民排队。
地铁服务在中午12小时过后慢慢恢复正常。香港运输及房屋局局长陈帆接受传媒访问时呼吁示威者应“透过其他和平、理性的方式表达诉求”,又认为他们在发起行动前应该考虑其他市民的需要。
香港铁路规定指出,在非紧急情况下按动紧急按钮或干扰地铁车门都是违反规定的行为,不恰当使用紧急设备面临最高5000港币罚款,但港铁总经理郑群兴没有透露有没有示威者被检控。
网络也流传港铁列车司机会在周二发起罢工,郑群兴只说他相信司机是“专业的团队”,又透露只有一两名职员请病假,是正常水平,没有影响列车运作。
此前,香港示威者多次发起其他“不合作运动”,包括堵塞一些政府大楼和公共交通设施,同样引来一些不满。之后一些示威者向途人派发传单,表达他们的要求,又向途人因为示威行动造成的不方便道歉。
香港理工大学专上学院讲师李峻嵘接受BBC中文访问时说,他认为目前要判断这种“不合作运动”会如何影响整场反对《逃犯条例》修订运动言之尚早。
他形容,各个阵营的举动对事态发展都会有影响,接下来仍然需要观察这些“不合作运动”真正影响到多少人、行动会否升级等因素,也要观察政府会否再犯下如元朗袭击等的错误。
数十名手持木棍等武器的人7月21日在元朗区一个车站袭击途人,造成多人受伤。香港警察被批评市民报案后超过半小时才抵达现场,反应缓慢,政务司司长张建宗之后为事件道歉。
一些香港公务员计划周五(8月2日)举行集会,正在向警察申请“不反对通知书”,希望把市民的声音反映给政府。李峻嵘认为,如果警察禁止集会,将会是香港政府处理风波的又一错误。
香港铁路公司(简称“港铁”)周二(7月30日)早上发出通知,收到多宗报告指乘客阻碍车门关闭和按动月台上的紧急按钮,令列车无法正常运作,上班族的行程受阻。其中穿越重要工商业地区的观塘线和港岛线更一度暂停部份服务。
就在前一天,中国国务院港澳事务办公室召开记者会,重申北京政府支持香港政府和特首林郑月娥的施政,又希望香港社会尽快走出政治纷争,集中精力发展经济、改善民生。
林郑月娥上月宣布暂缓《逃犯条例》修订,之后更形容修例工作已经“寿终正寝”,但示威者仍然坚持她要正式撤回修例建议,同时成立独立委员会,调查风波中警察滥用权力等指控,香港各处多次抗议中爆发严重警民冲突。
以年轻人为主导的网络讨论区,许多留言对“不合作运动”的评价正面,但上班族和舆论对这次行动的反应呈两极。反对者批评行动影响普通市民,会造成反效果;支持一方认为政府必须积极回应示威者的要求,才能平息风波。
香港警察早上差不多8时接到报告有人在市区观塘线一个车站阻碍列车车门关上,警察到场处理,一些乘客与参加“不合作运动”的人吵架,发生推撞。港铁最后宣布暂停观塘线部份服务,安排接驳公车接载乘客。
BBC中文记者现场观察所见,最高峰时期观塘有过百名乘客轮候接驳公车,秩序良好,但当区路面交通同时挤塞,成功登车的乘客仍然被困路上。不计算轮候接驳公车的时间,原本乘坐地铁只须五分钟的车程变成至少半小时。
乘客对运动的反应两极,一些认为香港政府应尽快回应示威者的要求,包括成立独立委员会调查警察滥权、怀疑黑社会份子早前在元朗车站无差别袭击途人的事件,和正式撤回《逃犯条例》修订,香港社会才会回复平静;但也有乘客认为示威者表达意见的时候不应影响其他人。
港铁在早上差不多11时再宣布,港岛线有类似情况发生,暂停那条路线的部份服务,又派出职员在车站外要求乘客乘坐其他交通工具,附近的公车站、计程车站和电车站有许多市民排队。
地铁服务在中午12小时过后慢慢恢复正常。香港运输及房屋局局长陈帆接受传媒访问时呼吁示威者应“透过其他和平、理性的方式表达诉求”,又认为他们在发起行动前应该考虑其他市民的需要。
香港铁路规定指出,在非紧急情况下按动紧急按钮或干扰地铁车门都是违反规定的行为,不恰当使用紧急设备面临最高5000港币罚款,但港铁总经理郑群兴没有透露有没有示威者被检控。
网络也流传港铁列车司机会在周二发起罢工,郑群兴只说他相信司机是“专业的团队”,又透露只有一两名职员请病假,是正常水平,没有影响列车运作。
此前,香港示威者多次发起其他“不合作运动”,包括堵塞一些政府大楼和公共交通设施,同样引来一些不满。之后一些示威者向途人派发传单,表达他们的要求,又向途人因为示威行动造成的不方便道歉。
香港理工大学专上学院讲师李峻嵘接受BBC中文访问时说,他认为目前要判断这种“不合作运动”会如何影响整场反对《逃犯条例》修订运动言之尚早。
他形容,各个阵营的举动对事态发展都会有影响,接下来仍然需要观察这些“不合作运动”真正影响到多少人、行动会否升级等因素,也要观察政府会否再犯下如元朗袭击等的错误。
数十名手持木棍等武器的人7月21日在元朗区一个车站袭击途人,造成多人受伤。香港警察被批评市民报案后超过半小时才抵达现场,反应缓慢,政务司司长张建宗之后为事件道歉。
一些香港公务员计划周五(8月2日)举行集会,正在向警察申请“不反对通知书”,希望把市民的声音反映给政府。李峻嵘认为,如果警察禁止集会,将会是香港政府处理风波的又一错误。
Wednesday, July 24, 2019
VLC Media player में बड़ी खामी, करोड़ों यूजर्स हो सकते हैं प्रभावित
VLC Media Player दुनिया भर में काफी पॉपुलर है. लेकिन इसमें एक गंभीर खामी पाई गई है. रिसर्चर्स ने यूजर्स को अगाह किया है. इससे करोड़ों यूजर्स प्रभावित हो सकते हैं और उन्हें नुकसान भी हो सकता है. जर्मनी की एक फर्म CERT-Bund के सिक्योरिटी रिसर्चर्स ने कहा है कि उन्होंने VLC Media player के वीडियो प्लेयर में एक खामी ढूंढी है. इसका फायदा उठा कर हैकर्स यूजर्स के डिवाइस को ऐक्सेस कर सकते हैं.
इस सिक्योरिटी फर्म ने कहा है कि VLC Media Player के इस गंभीर खामी की वजह से रिमोट कोड एक्जिक्यूशन एनेबल होता है जिससे डेटा/फाइल्स और ओवरऑल सर्विस को हाइजैक किया जा सकता है. इसके जरिए डिवाइस का ऐक्सेस लेकर हैकर्स खतरनाक सॉफ्टवेयर भी इंजेक्ट कर सकते हैं. हालांकि अब तक ऐसा हुआ है.
VLC Media Player की ये दिक्कत Windows, Linux और Unix वर्जन में पाई गई है. हालांकि बताया गया है कि इससे macOS सुरक्षित हैं. Video LAN, ने इस इश्यू को माना है और कंपनी ने कहा है कि इसके पैच पर काम किया जा रहा है यानी इसे ठीक किया जा रहा है. वीडियो लैन VLC मीडिया प्लेयर की पेरेंट कंपनी है. कंपनी ने कहा है कि 60% कंप्लीट हो चुका है.
हालांकि Video LAN ने इस बात से साफ इनकार कर दिया है कि VLC Media Player का ये बग VLC को क्रैश कर रहा है. लेकिन फिर भी आप फिलहाल VLC से MKV फाइल चलाने से बचें. कंपनी ने कहा है कि अब ऐसी कोई समस्या नहीं है.
गौरतलब है कि ये मीडिया प्लेयर फ्री है, फास्ट भी है. इस वजह से ये दुनिया भर में इसके काफी यूजर्स हैं और करोड़ों लोग इसे यूज करते हैं. इसलिए ये खामी ज्यादा लोगों को प्रभावित कर सकती है.
हालांकि कंपनी का कहना है कि इसे हटाने की जरूरत नहीं है. ये खामी मुख्य तौर पर MKV फाइल के साथ है जो वीडियो फाइल ही है. यानी अगर आप इंटरनेट से MKV फाइल डाउनलोड करके इसे VLC से चलाते हैं तो मुमकिन है आपका कंप्यूटर हैक हो जाए. लेकिन अब तक ऐसा कोई इंसिडेंट नहीं मिला है.
यूं तो इनर लाइन परमिट रूल पहले जम्मू-कश्मीर में भी लागू था, मगर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के आंदोलन के बाद वहां परमिट सिस्टम खत्म हो गया. लेकिन, नागालैंड में यह नियम आज भी जारी है. अब यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर बहस का विषय बनने लगा है.
हाल ही में बीजेपी नेता अश्निनी उपाध्याय इस मामले को सुप्रीम कोर्ट लेकर पहुंचे तो वहीं बीते 23 जुलाई को दो सांसदों ने भी लोकसभा में इनर लाइन परमिट सिस्टम के मुद्दे को उठाया. जिस पर सरकार ने कहा है कि भारतीय नागरिकों को अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और दीमापुर को छोड़कर नगालैंड में यात्रा के लिए इनर लाइन परमिट की जरूरत होती है. दीमापुर के लिए इनर लाइन परमिट लागू करने के लिए राज्य सरकार के प्रस्ताव पर अभी विचार-विमर्श चल रहा है.
आंतरिक वीजा जैसा होता है इनर लाइन परमिट
देश में इस वक्त सिर्फ नागालैंड में ही इनर लाइन परमिट सिस्टम लागू है. बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेग्यूलेशन्स, 1873 के तहत यह व्यवस्था एक सीमित अवधि के लिए किसी संरक्षित, प्रतिबंधित क्षेत्र में दाखिल होने के लिए अनुमति देता है. नौकरी या फिर पर्यटन के लिए पहुंचने वालों को अनुमति लेनी जरूरी है. बताया जाता है कि गुलामी के दौर में ब्रिटिश सरकार ने इनर लाइन परमिट सिस्टम की शुरुआत की थी. तब नागालैंड क्षेत्र में जड़ी-बूटियों और प्राकृतिक औषधियों का प्रचुर भंडार था. जिसे ब्रिटेन भेजा जाता था. औषधियों पर दूसरों की नजर न पड़े, इसके लिए ब्रिटिश शासन ने नागालैंड के हिस्से में इनर लाइन परमिट की शुरुआत की थी. ताकि इस इलाके का संपर्क बाहरी क्षेत्रों से न हो सके.
आजादी के बाद भी सरकार ने इनर लाइन परमिट को जारी रखा. इसके पीछे तर्क था कि नागा आदिवासियों का रहन-सहन, कला संस्कृति, बोलचाल औरों से अलग है. ऐसे में इनके संरक्षण के लिए इनर लाइन परमिट जरूरी है. ताकि बाहरी लोग यहां रहकर उनकी संस्कृति प्रभावित न कर सकें
इस सिक्योरिटी फर्म ने कहा है कि VLC Media Player के इस गंभीर खामी की वजह से रिमोट कोड एक्जिक्यूशन एनेबल होता है जिससे डेटा/फाइल्स और ओवरऑल सर्विस को हाइजैक किया जा सकता है. इसके जरिए डिवाइस का ऐक्सेस लेकर हैकर्स खतरनाक सॉफ्टवेयर भी इंजेक्ट कर सकते हैं. हालांकि अब तक ऐसा हुआ है.
VLC Media Player की ये दिक्कत Windows, Linux और Unix वर्जन में पाई गई है. हालांकि बताया गया है कि इससे macOS सुरक्षित हैं. Video LAN, ने इस इश्यू को माना है और कंपनी ने कहा है कि इसके पैच पर काम किया जा रहा है यानी इसे ठीक किया जा रहा है. वीडियो लैन VLC मीडिया प्लेयर की पेरेंट कंपनी है. कंपनी ने कहा है कि 60% कंप्लीट हो चुका है.
हालांकि Video LAN ने इस बात से साफ इनकार कर दिया है कि VLC Media Player का ये बग VLC को क्रैश कर रहा है. लेकिन फिर भी आप फिलहाल VLC से MKV फाइल चलाने से बचें. कंपनी ने कहा है कि अब ऐसी कोई समस्या नहीं है.
गौरतलब है कि ये मीडिया प्लेयर फ्री है, फास्ट भी है. इस वजह से ये दुनिया भर में इसके काफी यूजर्स हैं और करोड़ों लोग इसे यूज करते हैं. इसलिए ये खामी ज्यादा लोगों को प्रभावित कर सकती है.
हालांकि कंपनी का कहना है कि इसे हटाने की जरूरत नहीं है. ये खामी मुख्य तौर पर MKV फाइल के साथ है जो वीडियो फाइल ही है. यानी अगर आप इंटरनेट से MKV फाइल डाउनलोड करके इसे VLC से चलाते हैं तो मुमकिन है आपका कंप्यूटर हैक हो जाए. लेकिन अब तक ऐसा कोई इंसिडेंट नहीं मिला है.
यूं तो इनर लाइन परमिट रूल पहले जम्मू-कश्मीर में भी लागू था, मगर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के आंदोलन के बाद वहां परमिट सिस्टम खत्म हो गया. लेकिन, नागालैंड में यह नियम आज भी जारी है. अब यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर बहस का विषय बनने लगा है.
हाल ही में बीजेपी नेता अश्निनी उपाध्याय इस मामले को सुप्रीम कोर्ट लेकर पहुंचे तो वहीं बीते 23 जुलाई को दो सांसदों ने भी लोकसभा में इनर लाइन परमिट सिस्टम के मुद्दे को उठाया. जिस पर सरकार ने कहा है कि भारतीय नागरिकों को अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और दीमापुर को छोड़कर नगालैंड में यात्रा के लिए इनर लाइन परमिट की जरूरत होती है. दीमापुर के लिए इनर लाइन परमिट लागू करने के लिए राज्य सरकार के प्रस्ताव पर अभी विचार-विमर्श चल रहा है.
आंतरिक वीजा जैसा होता है इनर लाइन परमिट
देश में इस वक्त सिर्फ नागालैंड में ही इनर लाइन परमिट सिस्टम लागू है. बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेग्यूलेशन्स, 1873 के तहत यह व्यवस्था एक सीमित अवधि के लिए किसी संरक्षित, प्रतिबंधित क्षेत्र में दाखिल होने के लिए अनुमति देता है. नौकरी या फिर पर्यटन के लिए पहुंचने वालों को अनुमति लेनी जरूरी है. बताया जाता है कि गुलामी के दौर में ब्रिटिश सरकार ने इनर लाइन परमिट सिस्टम की शुरुआत की थी. तब नागालैंड क्षेत्र में जड़ी-बूटियों और प्राकृतिक औषधियों का प्रचुर भंडार था. जिसे ब्रिटेन भेजा जाता था. औषधियों पर दूसरों की नजर न पड़े, इसके लिए ब्रिटिश शासन ने नागालैंड के हिस्से में इनर लाइन परमिट की शुरुआत की थी. ताकि इस इलाके का संपर्क बाहरी क्षेत्रों से न हो सके.
आजादी के बाद भी सरकार ने इनर लाइन परमिट को जारी रखा. इसके पीछे तर्क था कि नागा आदिवासियों का रहन-सहन, कला संस्कृति, बोलचाल औरों से अलग है. ऐसे में इनके संरक्षण के लिए इनर लाइन परमिट जरूरी है. ताकि बाहरी लोग यहां रहकर उनकी संस्कृति प्रभावित न कर सकें
Thursday, July 4, 2019
"Глубже любой подлодки": западные эксперты о трагедии в Баренцевом море
1 июля пожар на глубоководном аппарате в Баренцевом море унес жизни четырнадцати российских офицеров. По просьбе Би-би-си ведущие западные эксперты прокомментировали трагедию.
Авария может ударить по репутации российского флота, но по ней нельзя судить о его состоянии, считают аналитики из европейских и американских мозговых центров.
Боеготовность ВМФ России достигла наивысшей точки с начала 1990-х, и подводные лодки - самая современная его часть, по мнению опрошенных Би-би-си аналитиков из стран НАТО.
Эксперты также сошлись во мнении, что авария произошла именно на сверхсекретной глубоководной атомной станции, которую неофициально называют "Лошариком".
Все-таки "Лошарик"
В среду 3 июля пресс-секретарь президента России Дмитрий Песков заявил, что информация о том, на каком конкретно глубоководном аппарате 1 июля произошел пожар, считается секретной.
Однако появившиеся за двое суток подробности позволили предположить, что речь идет о глубоководной атомной станции проекта 10831, которую, по одним данным, официально называют АС-31, по другим - АС-12, а неофициально - "Лошарик".
Этот аппарат не является боевой подлодкой, он относится к Главному управлению глубоководных исследований министерства обороны России.
"Тема глубоководных станций является одной из самых засекреченных в России, как и деятельность Главного управления глубоководных исследований министерства обороны в целом", - рассказал Би-би-си Леонид Нерсисян, автор британского агентства Jane's by IHS Markit и внештатный эксперт немецкого фонда Конрада Аденауэра.
Аппарат состоит из нескольких титановых отсеков-сфер, соединенных между собой переходами, и в одном из них находится ядерная силовая установка, рассказал эксперт.
Утром в среду на встрече с президентом России Владимиром Путиным министр обороны Сергей Шойгу рассказал о работах по восстановлению аппарарта. В частности, он подтвердил версию о том, что на нем была установлена атомная энергетическая установка.
Функционал "Лошарика", по словам Нерсисяна, включает исследования морского дна, выявление и поднятие со дна предметов (это могут быть и чувствительные военные технологии).
"Лошарик" способен проводить работы на большой глубине, в том числе перерезать интернет-кабели, сказал Мэтью Булег, сотрудник Королевского института международных отношений Chatham House.
Аппарат "может опускаться глубже практически любой другой подводной лодки в мире", считает эксперт американского центра Atlantic Council Марк Симаковский.
По его словам, подлодка "обладает потрясающими возможностями глубоководных операций".
Эксперт добавил, что "Лошарик" мог участвовать в операции на Хребте Ломоносова в 2018 году. Это подводный хребет в Северном Ледовитом океане, за счет которого Россия добивается расширения своей исключительной экономической зоны в Арктике.
По неподтвержденным сообщениям, разработка второго судна такого же типа началась в 2012 году, рассказал Би-би-си Алекс Пейп, редактор отраслевого справочника Jane's Fighting Ships.
В ряде публикаций в качестве возможного носителя аппарата "Лошарик" называлась атомная подлодка БС-136 "Оренбург".
Однако опрошенные Би-би-си эксперты так не думают.
Носителем "Лошарика" была атомная подлодка БС-64 "Подмосковье", а БС-136 "Оренбург" не мог использоваться, так как он устарел, сказали Би-би-си автор Jane's by IHS Markit Леонид Нерсисян и турецкий эксперт Ерюк Ишык.
"Оренбург" фактически списан, заявил в интервью Би-би-си Майкл Кофман из американского центра военно-морского анализа CNA Corporation.
Кофман добавил, что подлодка могла осуществлять погружение без носителя, поскольку пожар произошел в территориальных водах России, недалеко от Кольского залива.
В опубликованном в среду списке погибших - семь капитанов первого ранга, из них двое были удостоены звания героя России. В числе погибших значатся также три капитана второго ранга, два капитана третьего ранга, капитан-лейтенант и подполковник медицинской службы.
"Это странно, что на одном корабле было столько старших офицеров, капитанов первого ранга", - считает Симаковский из Atlantic Council.
Из-за близости судна к России на момент аварии можно предположить, что происходила демонстрация капитанам возможностей корабля, добавил он.
С ним соглашается военный эксперт Роберт Фарли из американского Университета Кентукки.
"Демонстрация - единственное объяснение, почему так много офицеров находилось на одной подлодке", - сказал Фарли.
Авария может ударить по репутации российского флота, но по ней нельзя судить о его состоянии, считают аналитики из европейских и американских мозговых центров.
Боеготовность ВМФ России достигла наивысшей точки с начала 1990-х, и подводные лодки - самая современная его часть, по мнению опрошенных Би-би-си аналитиков из стран НАТО.
Эксперты также сошлись во мнении, что авария произошла именно на сверхсекретной глубоководной атомной станции, которую неофициально называют "Лошариком".
Все-таки "Лошарик"
В среду 3 июля пресс-секретарь президента России Дмитрий Песков заявил, что информация о том, на каком конкретно глубоководном аппарате 1 июля произошел пожар, считается секретной.
Однако появившиеся за двое суток подробности позволили предположить, что речь идет о глубоководной атомной станции проекта 10831, которую, по одним данным, официально называют АС-31, по другим - АС-12, а неофициально - "Лошарик".
Этот аппарат не является боевой подлодкой, он относится к Главному управлению глубоководных исследований министерства обороны России.
"Тема глубоководных станций является одной из самых засекреченных в России, как и деятельность Главного управления глубоководных исследований министерства обороны в целом", - рассказал Би-би-си Леонид Нерсисян, автор британского агентства Jane's by IHS Markit и внештатный эксперт немецкого фонда Конрада Аденауэра.
Аппарат состоит из нескольких титановых отсеков-сфер, соединенных между собой переходами, и в одном из них находится ядерная силовая установка, рассказал эксперт.
Утром в среду на встрече с президентом России Владимиром Путиным министр обороны Сергей Шойгу рассказал о работах по восстановлению аппарарта. В частности, он подтвердил версию о том, что на нем была установлена атомная энергетическая установка.
Функционал "Лошарика", по словам Нерсисяна, включает исследования морского дна, выявление и поднятие со дна предметов (это могут быть и чувствительные военные технологии).
"Лошарик" способен проводить работы на большой глубине, в том числе перерезать интернет-кабели, сказал Мэтью Булег, сотрудник Королевского института международных отношений Chatham House.
Аппарат "может опускаться глубже практически любой другой подводной лодки в мире", считает эксперт американского центра Atlantic Council Марк Симаковский.
По его словам, подлодка "обладает потрясающими возможностями глубоководных операций".
Эксперт добавил, что "Лошарик" мог участвовать в операции на Хребте Ломоносова в 2018 году. Это подводный хребет в Северном Ледовитом океане, за счет которого Россия добивается расширения своей исключительной экономической зоны в Арктике.
По неподтвержденным сообщениям, разработка второго судна такого же типа началась в 2012 году, рассказал Би-би-си Алекс Пейп, редактор отраслевого справочника Jane's Fighting Ships.
В ряде публикаций в качестве возможного носителя аппарата "Лошарик" называлась атомная подлодка БС-136 "Оренбург".
Однако опрошенные Би-би-си эксперты так не думают.
Носителем "Лошарика" была атомная подлодка БС-64 "Подмосковье", а БС-136 "Оренбург" не мог использоваться, так как он устарел, сказали Би-би-си автор Jane's by IHS Markit Леонид Нерсисян и турецкий эксперт Ерюк Ишык.
"Оренбург" фактически списан, заявил в интервью Би-би-си Майкл Кофман из американского центра военно-морского анализа CNA Corporation.
Кофман добавил, что подлодка могла осуществлять погружение без носителя, поскольку пожар произошел в территориальных водах России, недалеко от Кольского залива.
В опубликованном в среду списке погибших - семь капитанов первого ранга, из них двое были удостоены звания героя России. В числе погибших значатся также три капитана второго ранга, два капитана третьего ранга, капитан-лейтенант и подполковник медицинской службы.
"Это странно, что на одном корабле было столько старших офицеров, капитанов первого ранга", - считает Симаковский из Atlantic Council.
Из-за близости судна к России на момент аварии можно предположить, что происходила демонстрация капитанам возможностей корабля, добавил он.
С ним соглашается военный эксперт Роберт Фарли из американского Университета Кентукки.
"Демонстрация - единственное объяснение, почему так много офицеров находилось на одной подлодке", - сказал Фарли.
Tuesday, June 25, 2019
美食美味科学:探索舌尖上的甜酸苦辣
有些食物可能会博得大多数人的喜爱,比如巧克力、涂上黄油的土司等,但另外一些食品例如甘草和椰丝就不见得人人都能接受得了。
而造成人们喜欢不同食品的原因都有哪些呢?除了个人爱好、饮食习惯等因素,其实这背后有着严肃的科学在里面。
味蕾是舌上面、上颚和会厌表面的乳头状微型结构(papillae),其作用在于提供进食食物的味觉讯号。平均来讲, 人的舌上大约有一万个味蕾。
然而,味蕾数量也因人而异。因此,有人可能对味觉超级敏感,这些人在英语里被称为super tasters。
这意味着他们对某些味道,例如酸味或是苦味特别敏感。
与之相反,另外一些人舌头上的味蕾相对较少。他们对一些强烈味道没有那么敏感。这些人则是subtasters。
比如,如果你能吃超辣的咖哩,一点事没有,那你可能属于subtasers, 即味蕾较少的一类。
如果想知道你自己属于哪一种类型,可以做一个小测试。方法是在舌头上涂上一种蓝色食用色素,如果你舌头并没有变得很蓝,说明你味蕾较多,是super tasters。原因是蓝色色素通常不会粘在舌头的味蕾上。
当然,味蕾只是我们每个人对食品有不同喜好的一个原因而已。除此之外,可能还有遗传基因的影响。
我们从一出生起就本能地喜欢甜味,不喜欢苦味。这和人类生存进化有关,因为那些味道不佳的食物通常可能会对人体器官有害。
我们舌头上大约有25个苦味感受器,但也存在个体差异。
这些感受器主要用于鉴别苦味,其中一个叫TAS2R38的感受器可以品尝出一种叫苯硫脲和丙硫氧嘧啶(Propylthiouracil, 或简称PROP)或者相关物质的苦味。
有研究显示,并不是每个人都能尝出这种苦味。如果你感觉不到的话,你可能更喜欢吃辣椒和油腻食品。
当我们还在娘胎里的时候,只能是妈妈吃什么我们就跟着吃什么。出生后,母亲乳汁的味道也对我们有一定的影响。
但断奶后,就要看我们早期接触食物的种类了。
亚利桑那州立大学的心理学家菲利普斯(Elizabeth Phillips)说,人们在2岁之前可以说是什么都吃。
但是她表示,到了2岁之后情况就发生了变化。任何你2岁之前没有尝过的味道或是新食物你很可能都不会喜欢。
但这并不意味着你永远不会喜欢新东西。有些食品可能你一开始并不喜欢,但会逐渐适应,甚至上瘾的。
例如, 略带苦味的啤酒。人们并非第一次喝就一定喜欢。但可以慢慢培养,喜欢上啤酒的味道。
美国耶鲁大学精神病学和心理学教授斯冒尔(Dana Small) 表示,当我们摄取某种食物时,会释放出各种荷尔蒙。机体的血糖和新陈代谢都会发生变化,它对大脑对这些味道的解读至关重要。
如果你大脑对你接触到的这种新口味感受是肯定的,那么下次你再品尝该种食品或饮料时就会更喜欢。
反之,如果你第一次接触某种新食品或饮料让你不舒适,就会启动你大脑的生存机制。这会让你厌恶它,你的大脑则将其气味和味道与中毒联系起来。
综上所述,人们喜欢不同食品除了与人类进化、文化、性别、经历、遗传和味蕾等有关外,还有不容忽视的一点,是食物本身的口感。
有些人不喜欢或是喜欢某种食物是因为这种食物的特殊口感,但在这方面,科学至此还无法给出令人满意的解释。
而造成人们喜欢不同食品的原因都有哪些呢?除了个人爱好、饮食习惯等因素,其实这背后有着严肃的科学在里面。
味蕾是舌上面、上颚和会厌表面的乳头状微型结构(papillae),其作用在于提供进食食物的味觉讯号。平均来讲, 人的舌上大约有一万个味蕾。
然而,味蕾数量也因人而异。因此,有人可能对味觉超级敏感,这些人在英语里被称为super tasters。
这意味着他们对某些味道,例如酸味或是苦味特别敏感。
与之相反,另外一些人舌头上的味蕾相对较少。他们对一些强烈味道没有那么敏感。这些人则是subtasters。
比如,如果你能吃超辣的咖哩,一点事没有,那你可能属于subtasers, 即味蕾较少的一类。
如果想知道你自己属于哪一种类型,可以做一个小测试。方法是在舌头上涂上一种蓝色食用色素,如果你舌头并没有变得很蓝,说明你味蕾较多,是super tasters。原因是蓝色色素通常不会粘在舌头的味蕾上。
当然,味蕾只是我们每个人对食品有不同喜好的一个原因而已。除此之外,可能还有遗传基因的影响。
我们从一出生起就本能地喜欢甜味,不喜欢苦味。这和人类生存进化有关,因为那些味道不佳的食物通常可能会对人体器官有害。
我们舌头上大约有25个苦味感受器,但也存在个体差异。
这些感受器主要用于鉴别苦味,其中一个叫TAS2R38的感受器可以品尝出一种叫苯硫脲和丙硫氧嘧啶(Propylthiouracil, 或简称PROP)或者相关物质的苦味。
有研究显示,并不是每个人都能尝出这种苦味。如果你感觉不到的话,你可能更喜欢吃辣椒和油腻食品。
当我们还在娘胎里的时候,只能是妈妈吃什么我们就跟着吃什么。出生后,母亲乳汁的味道也对我们有一定的影响。
但断奶后,就要看我们早期接触食物的种类了。
亚利桑那州立大学的心理学家菲利普斯(Elizabeth Phillips)说,人们在2岁之前可以说是什么都吃。
但是她表示,到了2岁之后情况就发生了变化。任何你2岁之前没有尝过的味道或是新食物你很可能都不会喜欢。
但这并不意味着你永远不会喜欢新东西。有些食品可能你一开始并不喜欢,但会逐渐适应,甚至上瘾的。
例如, 略带苦味的啤酒。人们并非第一次喝就一定喜欢。但可以慢慢培养,喜欢上啤酒的味道。
美国耶鲁大学精神病学和心理学教授斯冒尔(Dana Small) 表示,当我们摄取某种食物时,会释放出各种荷尔蒙。机体的血糖和新陈代谢都会发生变化,它对大脑对这些味道的解读至关重要。
如果你大脑对你接触到的这种新口味感受是肯定的,那么下次你再品尝该种食品或饮料时就会更喜欢。
反之,如果你第一次接触某种新食品或饮料让你不舒适,就会启动你大脑的生存机制。这会让你厌恶它,你的大脑则将其气味和味道与中毒联系起来。
综上所述,人们喜欢不同食品除了与人类进化、文化、性别、经历、遗传和味蕾等有关外,还有不容忽视的一点,是食物本身的口感。
有些人不喜欢或是喜欢某种食物是因为这种食物的特殊口感,但在这方面,科学至此还无法给出令人满意的解释。
Monday, June 17, 2019
Мужской суицид: чем он отличается от женского и почему случается чаще
По всему миру статистика одинакова: женщины чаще страдают от депрессии, чаще склонны покончить с собой, но самоубийц тем не менее больше среди мужчин. Отчего так?
Шесть лет назад мой брат покончил с собой. Ему было 28.
К несчастью, самоубийства случаются не так редко, как нам хотелось бы думать.
Согласно данным Всемирной организации здравоохранения (ВОЗ) за 2016 год (это самая последняя глобальная статистика, которую можно найти на эту тему), в мире было совершено около 793 000 самоубийств. Большинство - мужчины.
Тем не менее самоубийство по-прежнему остается главной причиной смерти у мужчин до 45 лет. И гендерный разрыв никуда не девается. Среди британских женщин уровень суицидов - треть от мужского, 4,9 на 100 000.
Во многих других странах картина та же. В Австралии мужчины гибнут в результате самоубийства с вероятностью в три раза большей, чем женщины. В США - в 3,5 раза. А в России и Аргентине - более чем в четыре раза.
Данные ВОЗ показывают, что около 40% стран имеют еще более устрашающие показатели: более 15 суицидов на 100 000 мужчин, при этом только в 1,5% стран похожая цифра - у женщин.
Этой тенденции уже много лет. "С тех пор, как мы начали вести эту статистику, существует такое неравенство", - говорит психолог Джилл Харкави-Фридман, вице-президент, отвечающий за исследования, в Американском фонде предотвращения самоубийств, организации, оказывающей поддержку тем, кто пережил самоубийство.
Суицид - очень деликатный и сложный предмет, в котором переплетается множество причин, и то, что люди кончают с собой, естественным образом отсекает нас от полного понимания того, почему они это сделали.
Тем не менее, поскольку мы все больше разбираемся в проблемах психического здоровья, растет и понимание тех факторов, которые влияют на этот трагический выбор.
Один из сложных вопросов - почему такое различие между женщинами и мужчинами. Он тем более непонятен, поскольку женщинам, как правило, чаще ставят диагноз "депрессия".
Более того, женщины с большей долей вероятности предпринимают попытку покончить с собой. Например, в США взрослые женщины делают это в 1,2 раза чаще, чем мужчины.
Вот только методы у мужчин часто гораздо более радикальные, в результате чего помощь, даже если и приходит, оказывается запоздалой - уже ничего поделать нельзя. Ну и то, что у мужчин больше доступ к средствам самоубийства, тоже играет роль.
Кроме того, мужчины чаще прибегают к столь радикальным способам потому, что у них больше решимости покончить с собой.
Отчего же мужчины так страдают? И можно ли с этим что-то сделать?
Факторы риска
Один из ключевых элементов - общение и общительность. Конечно, будет большим упрощением сказать, что женщины более склонны делиться своими проблемами, а мужчины - более замкнуты.
Но правда то, что на протяжении поколений в обществе существовал и существует стереотип: мужчины должны быть сильными и не должны признаваться в своих страданиях.
Часто это начинается с детства. "Мы твердим: мальчики никогда не плачут", - объясняет Колман О'Дрисколл, бывший исполнительный директор Lifeline, австралийского благотворительного общества, обеспечивающего 24-часовую психологическую поддержку тем, кто склонен к суициду.
"С самого раннего возраста мы приучаем мальчиков не показывать эмоций, потому что показывать эмоции - это "слабость", - говорит она.
Мара Грюнау, исполнительный директор канадского Центра по предотвращению самоубийств, указывает: очень многое зависит от того, как мы разговариваем с детьми, как учим их общению.
"Матери куда чаще разговаривают с дочерьми, чем с сыновьями, больше делятся с ними своими чувствами и опытом, - говорит она. - Мы будто по умолчанию ожидаем от женщин большей эмоциональности".
Мужчины же куда реже признаются, что чувствуют себя уязвимо - как самим себе, так и друзьям, не говоря уже о враче. Они более неохотно, чем женщины, обращаются за медицинской помощью - с вероятностью на 32% ниже, как выяснило одно из исследований British Medical Journal.
"Мужчины реже посещают врача по поводу проблем с психическим здоровьем, - подчеркивает Харкави-Фридман. - Не потому, что у них нет таких же проблем, как и у женщин, а потому что они реже осознают, что у них эти проблемы, что повышает риск суицида".
Если человек даже не осознает, что причина его состояния - стресс, то он и не думает о том, что кто-то или что-то может ему помочь.
Шесть лет назад мой брат покончил с собой. Ему было 28.
К несчастью, самоубийства случаются не так редко, как нам хотелось бы думать.
Согласно данным Всемирной организации здравоохранения (ВОЗ) за 2016 год (это самая последняя глобальная статистика, которую можно найти на эту тему), в мире было совершено около 793 000 самоубийств. Большинство - мужчины.
Тем не менее самоубийство по-прежнему остается главной причиной смерти у мужчин до 45 лет. И гендерный разрыв никуда не девается. Среди британских женщин уровень суицидов - треть от мужского, 4,9 на 100 000.
Во многих других странах картина та же. В Австралии мужчины гибнут в результате самоубийства с вероятностью в три раза большей, чем женщины. В США - в 3,5 раза. А в России и Аргентине - более чем в четыре раза.
Данные ВОЗ показывают, что около 40% стран имеют еще более устрашающие показатели: более 15 суицидов на 100 000 мужчин, при этом только в 1,5% стран похожая цифра - у женщин.
Этой тенденции уже много лет. "С тех пор, как мы начали вести эту статистику, существует такое неравенство", - говорит психолог Джилл Харкави-Фридман, вице-президент, отвечающий за исследования, в Американском фонде предотвращения самоубийств, организации, оказывающей поддержку тем, кто пережил самоубийство.
Суицид - очень деликатный и сложный предмет, в котором переплетается множество причин, и то, что люди кончают с собой, естественным образом отсекает нас от полного понимания того, почему они это сделали.
Тем не менее, поскольку мы все больше разбираемся в проблемах психического здоровья, растет и понимание тех факторов, которые влияют на этот трагический выбор.
Один из сложных вопросов - почему такое различие между женщинами и мужчинами. Он тем более непонятен, поскольку женщинам, как правило, чаще ставят диагноз "депрессия".
Более того, женщины с большей долей вероятности предпринимают попытку покончить с собой. Например, в США взрослые женщины делают это в 1,2 раза чаще, чем мужчины.
Вот только методы у мужчин часто гораздо более радикальные, в результате чего помощь, даже если и приходит, оказывается запоздалой - уже ничего поделать нельзя. Ну и то, что у мужчин больше доступ к средствам самоубийства, тоже играет роль.
Кроме того, мужчины чаще прибегают к столь радикальным способам потому, что у них больше решимости покончить с собой.
Отчего же мужчины так страдают? И можно ли с этим что-то сделать?
Факторы риска
Один из ключевых элементов - общение и общительность. Конечно, будет большим упрощением сказать, что женщины более склонны делиться своими проблемами, а мужчины - более замкнуты.
Но правда то, что на протяжении поколений в обществе существовал и существует стереотип: мужчины должны быть сильными и не должны признаваться в своих страданиях.
Часто это начинается с детства. "Мы твердим: мальчики никогда не плачут", - объясняет Колман О'Дрисколл, бывший исполнительный директор Lifeline, австралийского благотворительного общества, обеспечивающего 24-часовую психологическую поддержку тем, кто склонен к суициду.
"С самого раннего возраста мы приучаем мальчиков не показывать эмоций, потому что показывать эмоции - это "слабость", - говорит она.
Мара Грюнау, исполнительный директор канадского Центра по предотвращению самоубийств, указывает: очень многое зависит от того, как мы разговариваем с детьми, как учим их общению.
"Матери куда чаще разговаривают с дочерьми, чем с сыновьями, больше делятся с ними своими чувствами и опытом, - говорит она. - Мы будто по умолчанию ожидаем от женщин большей эмоциональности".
Мужчины же куда реже признаются, что чувствуют себя уязвимо - как самим себе, так и друзьям, не говоря уже о враче. Они более неохотно, чем женщины, обращаются за медицинской помощью - с вероятностью на 32% ниже, как выяснило одно из исследований British Medical Journal.
"Мужчины реже посещают врача по поводу проблем с психическим здоровьем, - подчеркивает Харкави-Фридман. - Не потому, что у них нет таких же проблем, как и у женщин, а потому что они реже осознают, что у них эти проблемы, что повышает риск суицида".
Если человек даже не осознает, что причина его состояния - стресс, то он и не думает о том, что кто-то или что-то может ему помочь.
Thursday, May 30, 2019
Полезно ли пожилым "жить чуть-чуть впроголодь" по совету Онищенко?
Геннадий Онищенко, депутат Госдумы и бывший главный санитарный врач России, призвал пожилых людей "жить чуть-чуть впроголодь". По его словам, такая диета в сочетании с физическими упражнениями поможет им бороться с лишним весом, в частности, с жировыми отложениями в области талии.
"Объем потребляемой пищи, особенно у возрастных людей, когда снижены обменные процессы, тоже должен быть эффективным. Сочетание - жить чуть-чуть впроголодь и заниматься физической нагрузкой - самое эффективное", - сказал Онищенко.
Он добавил, что "любой человек, который имеет избыточный вес, находится или пока еще в недиагностированной стадии диабета, или уже на ранней стадии заболевания".
Свои рекомендации по питанию Геннадий Онищенко дал в ответ на просьбу журналистов RNS прокомментировать результаты исследования, проведенного Американским гериатрическим обществом.
Исследователи из США пришли к выводу, что интервальные тренировки помогают пожилым людям бороться с жировыми отложениями в области талии, или "центральным ожирением". Этот вид ожирения вызывает больший риск развития сердечно-сосудистых заболеваний, чем другие виды, говорится в статье.
Участники эксперимента, 36 человек в возрасте около 70 лет, в течение 10 недель выполняли упражнения, чередуя их с отдыхом в соотношении 2:1 (например, 40 секунд упражнений и 20 секунд отдыха). Тренировки длились от 18 до 36 минут три раза в неделю и привели к потере у испытуемых около килограмма жира.
Предложение Онищенко жить впроголодь негативно восприняли в соцсетях. Пожилые люди в России - одна из самых незащищенных категорий населения. Средняя пенсия в стране около 14 тыс. рублей (215 долларов), это лишь на 5 тыс. рублей больше прожиточного минимума. Далеко не все пенсионеры имеют возможность качественно питаться.
Онищенко пришлось оправдываться: "Вот опять же всё передернули... Я - не за то, чтобы пожилые люди жили впроголодь. А я - против, чтобы у них росли животы. Мною было обращено внимание именно на рост животов. Потому что, как правило, полнота появляется в области талии. Это понятно? Надо идти по пути укрепления пресса!"
"Но голодный паек никто не предлагал. Не надо ерничать! А [надо питаться] в соответствии со своими потребностями физиологическими, а не теми, которые у вас выработались в течение той жизни, что шла до старшего возраста", - добавил он.
Питание, по мнению Онищенко, должно быть сдержанным и его должно быть меньше по объёму калорий. В интервью "Комсомольской правде" депутат уточнил, что его рекомендации относятся к людям старше 50 лет.
Голод или переедание?
"Если говорить о людях до 75 лет, то на них распространяются все те правила питания, которые действуют для людей молодого и среднего возраста, - сказала Би-би-си главный гериатр минздрава России Ольга Ткачева. - Что касается людей после 75 лет, то здесь более опасно не ожирение, а наоборот, синдром мальнутриции (недостаточности питания. - Прим. Би-би-си), когда они отказываются от еды или едят очень мало".
По ее словам, это происходит по разным причинам, не только из-за недостатка финансов: меняется восприятие вкусов, у людей нет аппетита, они забывают поесть, у них может быть депрессия, не могут выйти из дома за продуктами, не хотят или не могут приготовить обед.
По словам Анны Юргановой, гендиректора гериатрического центра "Наша забота", бывает и такое, что пожилые люди едят больше своей нормы - они начинают меньше двигаться, поэтому уменьшается потребность в калориях, но сохраняются прежние пищевые привычки. Потребность пожилых людей в калориях обычно примерно на 20% ниже, чем в молодости, рассказала она.
Белки, а не углеводы
Главное в рационе пожилых людей - не подсчет калорий, а сбалансированность питания, говорят врачи.
"Обмен веществ замедляется, поэтому питание должно быть более сбалансированным и содержать меньшее количество углеводов. Многие пенсионеры потребляют их из-за низких доходов - они не купят себе овощи, мясо, орехи, но могут пожарить блины или сварить макароны, эти продукты откладываются в виде лишних килограммов", - объясняет Анна Юрганова.
Она добавляет, что в пожилом возрасте важно потреблять белок - его недостаток приводит к потере мышечной массы. В результате мышцы перестают держать скелет в правильном положении, это приводит к артрозам, увеличиваются и риски падений.
По словам Ольги Ткачевой, пожилым людям требуется даже больше белка, чем молодым - 1,2 г на кг веса в день против 1 г для молодых.
"Было бы здорово немного ограничить потребление соли, если есть гипертония, но сильные ограничения в возрасте после 75 лет не рекомендуем", - говорит Ольга Ткачева.
У пожилых людей меняется восприятие жажды, поэтому иногда они забывают пить. "Как минимум 1,5 литра жидкости в день нужно выпивать", - говорит Ольга Ткачева. Также рекомендуется есть 400-600 граммов клетчатки - овощей, фруктов.
Критика от Онищенко
Геннадий Онищенко и раньше критиковал рацион россиян. Так, в 2012 году, занимая должность главы Роспотребнадзора, он советовал не посещать суши-бары.
"Зачем есть эту пораженную глистными инвазиями рыбу? Моды в питании быть не может. Сам факт поглощения такой рыбы небезразличен в худшую сторону для вашего организма, - говорил он. - Люди глотают ломоть непонятно чего, которое уже начинает разлагаться, и такие довольные сидят".
В 2013 году он критиковал потребление гамбургеров и суши, называя их экзотикой. "Мы уповаем на высокую сознательность и пищевой патриотизм наших граждан, которые уже давно отказались от использования этой пищи в своем питании", - говорил Онищенко.
"Объем потребляемой пищи, особенно у возрастных людей, когда снижены обменные процессы, тоже должен быть эффективным. Сочетание - жить чуть-чуть впроголодь и заниматься физической нагрузкой - самое эффективное", - сказал Онищенко.
Он добавил, что "любой человек, который имеет избыточный вес, находится или пока еще в недиагностированной стадии диабета, или уже на ранней стадии заболевания".
Свои рекомендации по питанию Геннадий Онищенко дал в ответ на просьбу журналистов RNS прокомментировать результаты исследования, проведенного Американским гериатрическим обществом.
Исследователи из США пришли к выводу, что интервальные тренировки помогают пожилым людям бороться с жировыми отложениями в области талии, или "центральным ожирением". Этот вид ожирения вызывает больший риск развития сердечно-сосудистых заболеваний, чем другие виды, говорится в статье.
Участники эксперимента, 36 человек в возрасте около 70 лет, в течение 10 недель выполняли упражнения, чередуя их с отдыхом в соотношении 2:1 (например, 40 секунд упражнений и 20 секунд отдыха). Тренировки длились от 18 до 36 минут три раза в неделю и привели к потере у испытуемых около килограмма жира.
Предложение Онищенко жить впроголодь негативно восприняли в соцсетях. Пожилые люди в России - одна из самых незащищенных категорий населения. Средняя пенсия в стране около 14 тыс. рублей (215 долларов), это лишь на 5 тыс. рублей больше прожиточного минимума. Далеко не все пенсионеры имеют возможность качественно питаться.
Онищенко пришлось оправдываться: "Вот опять же всё передернули... Я - не за то, чтобы пожилые люди жили впроголодь. А я - против, чтобы у них росли животы. Мною было обращено внимание именно на рост животов. Потому что, как правило, полнота появляется в области талии. Это понятно? Надо идти по пути укрепления пресса!"
"Но голодный паек никто не предлагал. Не надо ерничать! А [надо питаться] в соответствии со своими потребностями физиологическими, а не теми, которые у вас выработались в течение той жизни, что шла до старшего возраста", - добавил он.
Питание, по мнению Онищенко, должно быть сдержанным и его должно быть меньше по объёму калорий. В интервью "Комсомольской правде" депутат уточнил, что его рекомендации относятся к людям старше 50 лет.
Голод или переедание?
"Если говорить о людях до 75 лет, то на них распространяются все те правила питания, которые действуют для людей молодого и среднего возраста, - сказала Би-би-си главный гериатр минздрава России Ольга Ткачева. - Что касается людей после 75 лет, то здесь более опасно не ожирение, а наоборот, синдром мальнутриции (недостаточности питания. - Прим. Би-би-си), когда они отказываются от еды или едят очень мало".
По ее словам, это происходит по разным причинам, не только из-за недостатка финансов: меняется восприятие вкусов, у людей нет аппетита, они забывают поесть, у них может быть депрессия, не могут выйти из дома за продуктами, не хотят или не могут приготовить обед.
По словам Анны Юргановой, гендиректора гериатрического центра "Наша забота", бывает и такое, что пожилые люди едят больше своей нормы - они начинают меньше двигаться, поэтому уменьшается потребность в калориях, но сохраняются прежние пищевые привычки. Потребность пожилых людей в калориях обычно примерно на 20% ниже, чем в молодости, рассказала она.
Белки, а не углеводы
Главное в рационе пожилых людей - не подсчет калорий, а сбалансированность питания, говорят врачи.
"Обмен веществ замедляется, поэтому питание должно быть более сбалансированным и содержать меньшее количество углеводов. Многие пенсионеры потребляют их из-за низких доходов - они не купят себе овощи, мясо, орехи, но могут пожарить блины или сварить макароны, эти продукты откладываются в виде лишних килограммов", - объясняет Анна Юрганова.
Она добавляет, что в пожилом возрасте важно потреблять белок - его недостаток приводит к потере мышечной массы. В результате мышцы перестают держать скелет в правильном положении, это приводит к артрозам, увеличиваются и риски падений.
По словам Ольги Ткачевой, пожилым людям требуется даже больше белка, чем молодым - 1,2 г на кг веса в день против 1 г для молодых.
"Было бы здорово немного ограничить потребление соли, если есть гипертония, но сильные ограничения в возрасте после 75 лет не рекомендуем", - говорит Ольга Ткачева.
У пожилых людей меняется восприятие жажды, поэтому иногда они забывают пить. "Как минимум 1,5 литра жидкости в день нужно выпивать", - говорит Ольга Ткачева. Также рекомендуется есть 400-600 граммов клетчатки - овощей, фруктов.
Критика от Онищенко
Геннадий Онищенко и раньше критиковал рацион россиян. Так, в 2012 году, занимая должность главы Роспотребнадзора, он советовал не посещать суши-бары.
"Зачем есть эту пораженную глистными инвазиями рыбу? Моды в питании быть не может. Сам факт поглощения такой рыбы небезразличен в худшую сторону для вашего организма, - говорил он. - Люди глотают ломоть непонятно чего, которое уже начинает разлагаться, и такие довольные сидят".
В 2013 году он критиковал потребление гамбургеров и суши, называя их экзотикой. "Мы уповаем на высокую сознательность и пищевой патриотизм наших граждан, которые уже давно отказались от использования этой пищи в своем питании", - говорил Онищенко.
Wednesday, May 22, 2019
Instagram: в сеть утекли данные почти 50 млн пользователей, включая известных блогеров
На облачной платформе Amazon AWS обнаружили открытую базу с данными более чем 49 миллионов пользователей "Инстаграма", включая аккаунты знаменитостей, инфлюенсеров и брендов.
Данные в базе включали в себя не только общедоступную информацию из профиля соцсети, но также электронный адрес, номер телефона и данные о стоимости рекламы в аккаунте, пишет TechCrunch.
Эта цифра складывается из соотношения количества подписчиков к лайкам, охвата постов и вовлеченности подписчиков (фолловеров).
Каждая запись в базе данных содержала оценку стоимости каждого аккаунта, вычисляемую на основе числа фолловеров, вовлеченности и охвата аудитории, числа лайков и того, сколько раз постом поделились подисчики.
Обнаруживший в сети эту базу индийский исследователь Анураг Сен обратился к журналистам TechCrunch, которые смогли связать находку с базирующейся в Мумбаи компанией Chtrbox. Она занимается маркетингом в социальных сетях.
Данные помогали Chtrbox определить, сколько компания должна заплатить блогеру за рекламу.
В Instagram (компания принадлежит Facebook) заявили Би-би-си, что пытаются выяснить, откуда в базе взялись эти данные.
В TechCrunch в базе нашли несколько популярных блогеров и знаменитостей. Журналисты связались с несколькими блогерами, информация о которых была найдена в базе, и написали им их личные данные.
Двое подтвердили, что это их электронные ящики и телефоны, которые использовались для их учетных записей в Instagram. При этом они не имели никакого отношения к Chtrbox, пишет издание.
Вскоре после обращения в компанию Chtrbox закрыл базу данных. Там не ответили на запросы Би-би-си.
Сбор информации о пользователях Instagram нарушает политику социальной сети.
Инцидент произошел спустя два года после того, как Instagram признал, что ошибка в API-интерфейсе разработчика позволила хакерам получить адреса электронной почты и номера телефонов шести миллионов учетных записей пользователей. Позже хакеры продали эти данные за биткоины.
Данные в базе включали в себя не только общедоступную информацию из профиля соцсети, но также электронный адрес, номер телефона и данные о стоимости рекламы в аккаунте, пишет TechCrunch.
Эта цифра складывается из соотношения количества подписчиков к лайкам, охвата постов и вовлеченности подписчиков (фолловеров).
Каждая запись в базе данных содержала оценку стоимости каждого аккаунта, вычисляемую на основе числа фолловеров, вовлеченности и охвата аудитории, числа лайков и того, сколько раз постом поделились подисчики.
Обнаруживший в сети эту базу индийский исследователь Анураг Сен обратился к журналистам TechCrunch, которые смогли связать находку с базирующейся в Мумбаи компанией Chtrbox. Она занимается маркетингом в социальных сетях.
Данные помогали Chtrbox определить, сколько компания должна заплатить блогеру за рекламу.
В Instagram (компания принадлежит Facebook) заявили Би-би-си, что пытаются выяснить, откуда в базе взялись эти данные.
В TechCrunch в базе нашли несколько популярных блогеров и знаменитостей. Журналисты связались с несколькими блогерами, информация о которых была найдена в базе, и написали им их личные данные.
Двое подтвердили, что это их электронные ящики и телефоны, которые использовались для их учетных записей в Instagram. При этом они не имели никакого отношения к Chtrbox, пишет издание.
Вскоре после обращения в компанию Chtrbox закрыл базу данных. Там не ответили на запросы Би-би-си.
Сбор информации о пользователях Instagram нарушает политику социальной сети.
Инцидент произошел спустя два года после того, как Instagram признал, что ошибка в API-интерфейсе разработчика позволила хакерам получить адреса электронной почты и номера телефонов шести миллионов учетных записей пользователей. Позже хакеры продали эти данные за биткоины.
Thursday, April 25, 2019
مظاهرات السودان: المجلس العسكري يشكل لجنة مع قوى "إعلان الحرية والتغيير" لبحث الخلافات
أجرى المجلس العسكري الانتقالي في السودان محادثات مع قادة المتظاهرين الذين يطالبون بتسليم سريع للسطلة إلى إدارة مدنية.
وفي مؤتمر صحفي، أعلن المتحدث العسكري، شمس الدين كباشي، التوصل لاتفاق بشأن أغلب المطالب مع قوى "إعلان الحرية والتغيير".
كما أعلن كباشي اتفاق الجانبين على تشكيل لجنة لمناقشة نقاط الخلاف.
وأقر المتحدث أيضا بأن قوى "إعلان الحرية والتغيير" هي الممثلة للشعب السوداني.
هل يصبح المجلس العسكري في السودان طرفا في الأزمة الخليجية؟
كيف ارتدت الأخبار الكاذبة التي روجها النظام السوداني عليه؟
في غضون هذا، تقدم ثلاثة من أكثر أعضاء المجلس العسكري إثارة للجدل باستقالتهم، وهو أحد المطالب الرئيسية للمتظاهرين.
والثلاثة من الإسلاميين المتشددين وحلفاء للرئيس السابق عمر البشير، وهم عمر زين العابدين الشيخ، وجلال الدين الشيخ الطيب، والطيب بابكر علي.
ويعتزم المتظاهرون تنظيم احتجاج حاشد اليوم، مع ترقب وصول أعداد كبيرة من المتظاهرين إلى العاصمة الخرطوم.
وأدت أشهر من الاحتجاجات في السودان إلى الإطاحة بالرئيس عمر البشير.
وقاد عوض بن عوف عملية عزل الجيش للبشير بعد 3 عقود قضاها في السلطة إثر احتجاجات حاشدة ضد ارتفاع أسعار الغذاء وارتفاع معدل البطالة وقمع الحريات.
وبالرغم من هذا تواصلت المظاهرات المطالبة بالتعجيل بتسليم السلطة إلى المدنيين، والتخلص ممن يقول المتظاهرون إنهم رموز لحكم البشير.
وفي وقت لاحق، تنازل بن عوف عن رئاسة المجلس العسكري الحاكم إلى عبد الفتاح البرهان في محاولة لإرضاء المتظاهرين.
وفي مؤتمر صحفي، أعلن المتحدث العسكري، شمس الدين كباشي، التوصل لاتفاق بشأن أغلب المطالب مع قوى "إعلان الحرية والتغيير".
كما أعلن كباشي اتفاق الجانبين على تشكيل لجنة لمناقشة نقاط الخلاف.
وأقر المتحدث أيضا بأن قوى "إعلان الحرية والتغيير" هي الممثلة للشعب السوداني.
هل يصبح المجلس العسكري في السودان طرفا في الأزمة الخليجية؟
كيف ارتدت الأخبار الكاذبة التي روجها النظام السوداني عليه؟
في غضون هذا، تقدم ثلاثة من أكثر أعضاء المجلس العسكري إثارة للجدل باستقالتهم، وهو أحد المطالب الرئيسية للمتظاهرين.
والثلاثة من الإسلاميين المتشددين وحلفاء للرئيس السابق عمر البشير، وهم عمر زين العابدين الشيخ، وجلال الدين الشيخ الطيب، والطيب بابكر علي.
ويعتزم المتظاهرون تنظيم احتجاج حاشد اليوم، مع ترقب وصول أعداد كبيرة من المتظاهرين إلى العاصمة الخرطوم.
وأدت أشهر من الاحتجاجات في السودان إلى الإطاحة بالرئيس عمر البشير.
وقاد عوض بن عوف عملية عزل الجيش للبشير بعد 3 عقود قضاها في السلطة إثر احتجاجات حاشدة ضد ارتفاع أسعار الغذاء وارتفاع معدل البطالة وقمع الحريات.
وبالرغم من هذا تواصلت المظاهرات المطالبة بالتعجيل بتسليم السلطة إلى المدنيين، والتخلص ممن يقول المتظاهرون إنهم رموز لحكم البشير.
وفي وقت لاحق، تنازل بن عوف عن رئاسة المجلس العسكري الحاكم إلى عبد الفتاح البرهان في محاولة لإرضاء المتظاهرين.
Thursday, April 11, 2019
साइना, सिंधु, किदांबी और समीर सिंगापुर ओपन के क्वार्टर फाइनल में, कश्यप का अभियान खत्म
खेल डेस्क. भारतीय शटलर पीवी सिंधु और साइना नेहवाल सिंगापुर ओपन में वुमन्स सिंगल्स के क्वार्टर फाइनल में पहुंच गईं। मेन्स सिंगल्स में किदांबी श्रीकांत और समीर वर्मा भी अंतिम-8 में जगह बनाने में सफल रहे। हालांकि, पारुपल्ली कश्यप का टूर्नामेंट में अभियान खत्म हो गया। उन्हें वर्ल्ड चैम्पियन चीन के चेन लॉन्ग ने 21-9, 15-21, 21-16 से शिकस्त दी। मिक्स्ड डबल्स में प्रणव जेरी चोपड़ा और एन सिक्की रेड्डी की भारतीय जोड़ी क्वार्टर फाइनल में पहुंचने में सफल रही।
सिंधु ने मिया को 39 मिनट में हराया
वुमन्स सिंगल्स में सिंधु ने प्री-क्वार्टर फाइनल में डेनमार्क की मिया ब्लिचफेल्ट को 21-13, 21-19 से हराया। साइना ने थाइलैंड की पी. चोचुवॉन्ग को 21-16, 18-21, 21-19 से हराया।
टूर्नामेंट में चौथी वरीयता प्राप्त सिंधु ने दुनिया की 22वें नंबर की मिया को 39 मिनट में ही हरा दिया। इसके साथ ही भारतीय शटलर ने डेनमार्क की इस खिलाड़ी के खिलाफ लगातार दूसरी जीत दर्ज की। इससे पहले स्पेन मास्टर्स में भी हराया था।
दुनिया की नंबर-6 शटलर सिंधु का अगला मुकाबला चीन की काई यानयान से होगा। यानयान वर्ल्ड जूनियर चैम्पियनशिप में कांस्य पदक जीत चुकी हैं। वहीं, सिंधु इससे पहले पिछले महीने इंडिया ओपन के सेमीफाइनल में हार गईं थीं।
मेन्स सिंगल्स में समीर वर्मा ने प्री-क्वार्टर फाइनल मैच में वर्ल्ड नंबर 19 चीनी शटलर लू गुआंगजू को 21-15, 21-18 से हराया।
किदांबी ने वर्ल्ड नंबर 26 डेनमार्क के शटलर हैंस-क्रिस्टियान विटटिंगुस को 21-12, 23-21 से हराया। किदांबी एक समय दूसरे गेम में 12-18 से पिछड़ रहे थे। इसके बाद उन्होंने वापसी की और मैच जीत लिया।
मिक्स्ड डबल्स में प्रणव और सिक्की ने पांचवीं वरीयता प्राप्त तांग चुन मन और सी यिंग सुएट की हॉन्गकॉन्ग के शटलर्स की जोड़ी को 21-17, 6-21, 21-19 से हराया।
रायडू के फॉर्म में लौटने की उम्मीद
बल्लेबाजी में अंबाती रायडू फॉर्म में लौटना चाहेंगे। उनको छोड़कर फाफ डुप्लेसिस, शेन वॉटसन शानदार फॉर्म में चल रहे हैं। डेथ ओवर्स में महेंद्र सिंह धोनी की तेज बल्लेबाजी अन्य खिलाड़ियों को भी अच्छा प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित कर रही है।
राजस्थान की बल्लेबाजी ज्यादातर जोस बटलर और अजिंक्य रहाणे पर टिकी है। युवा बल्लेबाज संजू सैमसन ने एक मैच में शतक जरूर लगाया था, लेकिन उसके बाद से वे अपने उस प्रदर्शन को दोहरा नहीं पाए हैं। इसके अलावा स्टीव स्मिथ और बेन स्टोक्स को भी चेन्नई के खिलाफ अच्छे प्रदर्शन करने की जरूरत है।
दोनों टीमें इस प्रकार हैं
चेन्नई सुपरकिंग्स : महेंद्र सिंह धोनी (कप्तान), केएम आसिफ, सैम बिलिंग्स, चैतन्य बिश्नोई, ड्वेन ब्रावो, दीपक चाहर, फाफ डुप्लेसिस, ऋतुराज गायकवाड़, हरभजन सिंह, इमरान ताहिर, रविंद्र जडेजा, केदार जाधव, नारायण जगदीशन, स्कॉट कुगलिन, मोनू कुमार, सुरेश रैना, अंबाती रायडू, मिशेल सैंटनर, कर्ण शर्मा, ध्रुव शोरे, मोहित शर्मा, शार्दुल ठाकुर, मुरली विजय, शेन वॉटसन, डेविड विली।
राजस्थान रॉयल्स : अजिंक्य रहाणे (कप्तान), कृष्णप्पा गौतम, संजू सैमसन, श्रेयस गोपाल, आर्यमान बिड़ला, एस. मिधुन, प्रशांत चोपड़ा, स्टुअर्ट बिन्नी, राहुल त्रिपाठी, बेन स्टोक्स, स्टीव स्मिथ, जोस बटलर, जोफरा आर्चर, ईश सोढ़ी, धवल कुलकर्णी, महिपाल लोमरोर, जयदेव उनादकट, वरुण एरॉन, ओशेन थॉमस, शशांक सिंह, लियाम लिविंगस्टोन, शुभम रंजाने, मनन वोहरा, एश्टन टर्नर, रियान पराग।
सिंधु ने मिया को 39 मिनट में हराया
वुमन्स सिंगल्स में सिंधु ने प्री-क्वार्टर फाइनल में डेनमार्क की मिया ब्लिचफेल्ट को 21-13, 21-19 से हराया। साइना ने थाइलैंड की पी. चोचुवॉन्ग को 21-16, 18-21, 21-19 से हराया।
टूर्नामेंट में चौथी वरीयता प्राप्त सिंधु ने दुनिया की 22वें नंबर की मिया को 39 मिनट में ही हरा दिया। इसके साथ ही भारतीय शटलर ने डेनमार्क की इस खिलाड़ी के खिलाफ लगातार दूसरी जीत दर्ज की। इससे पहले स्पेन मास्टर्स में भी हराया था।
दुनिया की नंबर-6 शटलर सिंधु का अगला मुकाबला चीन की काई यानयान से होगा। यानयान वर्ल्ड जूनियर चैम्पियनशिप में कांस्य पदक जीत चुकी हैं। वहीं, सिंधु इससे पहले पिछले महीने इंडिया ओपन के सेमीफाइनल में हार गईं थीं।
मेन्स सिंगल्स में समीर वर्मा ने प्री-क्वार्टर फाइनल मैच में वर्ल्ड नंबर 19 चीनी शटलर लू गुआंगजू को 21-15, 21-18 से हराया।
किदांबी ने वर्ल्ड नंबर 26 डेनमार्क के शटलर हैंस-क्रिस्टियान विटटिंगुस को 21-12, 23-21 से हराया। किदांबी एक समय दूसरे गेम में 12-18 से पिछड़ रहे थे। इसके बाद उन्होंने वापसी की और मैच जीत लिया।
मिक्स्ड डबल्स में प्रणव और सिक्की ने पांचवीं वरीयता प्राप्त तांग चुन मन और सी यिंग सुएट की हॉन्गकॉन्ग के शटलर्स की जोड़ी को 21-17, 6-21, 21-19 से हराया।
रायडू के फॉर्म में लौटने की उम्मीद
बल्लेबाजी में अंबाती रायडू फॉर्म में लौटना चाहेंगे। उनको छोड़कर फाफ डुप्लेसिस, शेन वॉटसन शानदार फॉर्म में चल रहे हैं। डेथ ओवर्स में महेंद्र सिंह धोनी की तेज बल्लेबाजी अन्य खिलाड़ियों को भी अच्छा प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित कर रही है।
राजस्थान की बल्लेबाजी ज्यादातर जोस बटलर और अजिंक्य रहाणे पर टिकी है। युवा बल्लेबाज संजू सैमसन ने एक मैच में शतक जरूर लगाया था, लेकिन उसके बाद से वे अपने उस प्रदर्शन को दोहरा नहीं पाए हैं। इसके अलावा स्टीव स्मिथ और बेन स्टोक्स को भी चेन्नई के खिलाफ अच्छे प्रदर्शन करने की जरूरत है।
दोनों टीमें इस प्रकार हैं
चेन्नई सुपरकिंग्स : महेंद्र सिंह धोनी (कप्तान), केएम आसिफ, सैम बिलिंग्स, चैतन्य बिश्नोई, ड्वेन ब्रावो, दीपक चाहर, फाफ डुप्लेसिस, ऋतुराज गायकवाड़, हरभजन सिंह, इमरान ताहिर, रविंद्र जडेजा, केदार जाधव, नारायण जगदीशन, स्कॉट कुगलिन, मोनू कुमार, सुरेश रैना, अंबाती रायडू, मिशेल सैंटनर, कर्ण शर्मा, ध्रुव शोरे, मोहित शर्मा, शार्दुल ठाकुर, मुरली विजय, शेन वॉटसन, डेविड विली।
राजस्थान रॉयल्स : अजिंक्य रहाणे (कप्तान), कृष्णप्पा गौतम, संजू सैमसन, श्रेयस गोपाल, आर्यमान बिड़ला, एस. मिधुन, प्रशांत चोपड़ा, स्टुअर्ट बिन्नी, राहुल त्रिपाठी, बेन स्टोक्स, स्टीव स्मिथ, जोस बटलर, जोफरा आर्चर, ईश सोढ़ी, धवल कुलकर्णी, महिपाल लोमरोर, जयदेव उनादकट, वरुण एरॉन, ओशेन थॉमस, शशांक सिंह, लियाम लिविंगस्टोन, शुभम रंजाने, मनन वोहरा, एश्टन टर्नर, रियान पराग।
Wednesday, April 3, 2019
मुंबई-चेन्नई का मैच आज, वानखेड़े पर सुपरकिंग्स के खिलाफ इंडियंस का सक्सेस रेट 63%
खेल डेस्क. इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के 12वें संस्करण का 15वां मैच बुधवार को वानखेड़े स्टेडियम पर मुंबई इंडियंस और चेन्नई सुपरकिंग्स के खिलाफ खेला जाएगा। चेन्नई ने इस संस्करण में अब तक 3 मैच खेले हैं और सभी जीते हैं। वहीं, मुंबई की टीम 3 में से एक मैच में ही जीत हासिल कर पाई है।
वानखेड़े पर मुंबई और चेन्नई के बीच अब तक 8 मैच हुए हैं। इनमें से रोहित शर्मा की अगुआई वाली मुंबई इंडियंस 5 में जीत हासिल करने में सफल रही है। महेंद्र सिंह धोनी की चेन्नई सुपरकिंग्स 3 मैच ही जीत पाई है। ओवरऑल बात करें तो आईपीएल में मुंबई और चेन्नई के बीच अब तक 26 मैच हुए हैं। इनमें से मुंबई 14 और चेन्नई 12 में जीत हासिल करने में सफल रही है।
धोनी-रोहित के कप्तानी कौशल का भी मुकाबला
वैसे यह मुकाबला आईपीएल की दो सबसे सफल टीमों के कप्तानों के बीच होगा। मुंबई ने पिछले 6 साल में 3 बार खिताब जीता है। चेन्नई भी 3 बार की चैम्पियन है। दोनों टीमों के पास अच्छे मैच विजेता खिलाड़ी हैं जो अपने दम पर मैच जिता सकते हैं। हालांकि, काफी कुछ धोनी और रोहित पर निर्भर करेगा।
चेन्नई के खिलाफ पिछले 5 मैच में मुंबई का सक्सेस रेट 80%
आईपीएल में दोनों के बीच हुए पिछले 5 मुकाबलों की बात करें तो मुंबई की टीम 4 को जीतने में सफल रही है। चेन्नई ने इस मैदान पर आखिरी जीत पिछले साल 7 अप्रैल को हासिल की थी। उस मैच में उसने मुंबई को एक विकेट से हराया था। इसके बाद 28 अप्रैल 2018 को हुए मैच में मुंबई ने चेन्नई के खिलाफ 8 विकेट से जीत हासिल की थी। चेन्नई ने 2015 में वानखेड़े पर 3 मैच खेले थे और उसे तीनों में ही हार का सामना करना पड़ा था।
चेन्नई अंकतालिका में टॉप पर
इस संस्करण में चेन्नई सुपरकिंग्स ही ऐसी टीम है, जिसने अपने सभी मैच जीते हैं। वह 6 अंकों के साथ लीग तालिका में शीर्ष पर है। चेन्नई ने अपना पहला रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु के खिलाफ खेला था। तब उसने बेंगलुरु को 70 रन पर ऑलआउट करने के बाद 7 विकेट से मैच जीत लिया था। इसके बाद उसने दिल्ली कैपिटल्स को 6 विकेट और अगले मैच में राजस्थान रॉयल्स को आठ रन से हराया।
मुंबई इंडियंस के सिर्फ 2 अंक, तालिका में छठवें नंबर पर
वहीं, मुंबई इंडियंस महज दो अंकों के साथ तालिका में छठे नंबर पर है। उसने अपना पहला मैच घरेलू मैदान पर खेला, लेकिन तब दिल्ली ने उसे 37 रन से हरा दिया था। दूसरे मैच में वह बेंगलुरु को 6 रन से हराने में सफल रही। हालांकि, तीसरे मुकाबले में उसे किंग्स इलेवन पंजाब के हाथों 8 विकेट से हार झेलनी पड़ी थी।
चेन्नई के खिलाड़ी बेहतर फॉर्म में
चेन्नई की टीम अच्छी फॉर्म में है। उसका हर खिलाड़ी अपने तरीके से टीम के प्रदर्शन में योगदान दे रहा है। पिछले मैच में धोनी ने शानदार पारी खेलकर टीम की जीत की नींव रखी थी। बल्लेबाजी में उसके पास शेन वाटसन, सुरेश रैना, केदार जाधव और अंबाती रायडू जैसे अनुभवी और मैच का रुख मोड़ देने वाले खिलाड़ी हैं।
मुंबई के पास मैच विनर खिलाड़ी, लेकिन वे लय में नहीं
मुंबई की बात की जाए तो उसकी टीम में वह तालमेल नहीं दिखा है जो उसके पास मौजूद है। मैदान पर उसके खिलाड़ी लय में नहीं दिखे हैं। बल्लेबाजी में दक्षिण अफ्रीका के क्विंटन डीकॉक ही कुछ कमाल दिखा पाए हैं। रोहित शर्मा, कीरोन पोलार्ड का बल्ला खामोश रहा है। युवराज सिंह ने अपनी पुरानी फॉर्म की झलक जरूर दिखाई है, लेकिन वे अंत तक विकेट पर टिकने में असफल रहे हैं।
दोनों टीमें
मुंबई इंडियंस : रोहित शर्मा (कप्तान), जसप्रीत बुमराह, हार्दिक पंड्या, क्रुणाल पंड्या, युवराज सिंह, कीरोन पोलार्ड, लसिथ मलिंगा, राहुल चाहर, बेन कटिंग, पंकज जायसवाल, इशान किशन, सिद्धेश लाड, इविन लेविस, मयंक मार्कंडेय, मिशेल मैकक्लेनघन, अलजारी जोसेफ, जेसन बेहरेनडॉर्फ, अंकुल रॉय, रासिख सलाम, अनमोलप्रीत सिंह, बरिंदर सरन, आदित्य तारे, सूर्य कुमार यादव, जयंत यादव, क्विंटन डिकॉक।
चेन्नई सुपरकिंग्स : महेंद्र सिंह धोनी (कप्तान), सुरेश रैना, अंबाती रायडू, शेन वाटसन, फाफ डुप्लेसिस, मुरली विजय, केदार जाधव, सैम बिलिंग्स, रविंद्र जडेजा, ध्रुव शोरे, चैतन्य बिश्नोई, रितुराज गायकवाड़, ड्वेन ब्रावो, कर्ण शर्मा, इमरान ताहिर, हरभजन सिंह, मिशेल सैंटनर, शार्दुल ठाकुर, मोहित शर्मा, केएम आसिफ, दीपक चाहर, एन. जगदीशन, स्कॉट कुग्गेलेइजन।
वानखेड़े पर मुंबई और चेन्नई के बीच अब तक 8 मैच हुए हैं। इनमें से रोहित शर्मा की अगुआई वाली मुंबई इंडियंस 5 में जीत हासिल करने में सफल रही है। महेंद्र सिंह धोनी की चेन्नई सुपरकिंग्स 3 मैच ही जीत पाई है। ओवरऑल बात करें तो आईपीएल में मुंबई और चेन्नई के बीच अब तक 26 मैच हुए हैं। इनमें से मुंबई 14 और चेन्नई 12 में जीत हासिल करने में सफल रही है।
धोनी-रोहित के कप्तानी कौशल का भी मुकाबला
वैसे यह मुकाबला आईपीएल की दो सबसे सफल टीमों के कप्तानों के बीच होगा। मुंबई ने पिछले 6 साल में 3 बार खिताब जीता है। चेन्नई भी 3 बार की चैम्पियन है। दोनों टीमों के पास अच्छे मैच विजेता खिलाड़ी हैं जो अपने दम पर मैच जिता सकते हैं। हालांकि, काफी कुछ धोनी और रोहित पर निर्भर करेगा।
चेन्नई के खिलाफ पिछले 5 मैच में मुंबई का सक्सेस रेट 80%
आईपीएल में दोनों के बीच हुए पिछले 5 मुकाबलों की बात करें तो मुंबई की टीम 4 को जीतने में सफल रही है। चेन्नई ने इस मैदान पर आखिरी जीत पिछले साल 7 अप्रैल को हासिल की थी। उस मैच में उसने मुंबई को एक विकेट से हराया था। इसके बाद 28 अप्रैल 2018 को हुए मैच में मुंबई ने चेन्नई के खिलाफ 8 विकेट से जीत हासिल की थी। चेन्नई ने 2015 में वानखेड़े पर 3 मैच खेले थे और उसे तीनों में ही हार का सामना करना पड़ा था।
चेन्नई अंकतालिका में टॉप पर
इस संस्करण में चेन्नई सुपरकिंग्स ही ऐसी टीम है, जिसने अपने सभी मैच जीते हैं। वह 6 अंकों के साथ लीग तालिका में शीर्ष पर है। चेन्नई ने अपना पहला रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु के खिलाफ खेला था। तब उसने बेंगलुरु को 70 रन पर ऑलआउट करने के बाद 7 विकेट से मैच जीत लिया था। इसके बाद उसने दिल्ली कैपिटल्स को 6 विकेट और अगले मैच में राजस्थान रॉयल्स को आठ रन से हराया।
मुंबई इंडियंस के सिर्फ 2 अंक, तालिका में छठवें नंबर पर
वहीं, मुंबई इंडियंस महज दो अंकों के साथ तालिका में छठे नंबर पर है। उसने अपना पहला मैच घरेलू मैदान पर खेला, लेकिन तब दिल्ली ने उसे 37 रन से हरा दिया था। दूसरे मैच में वह बेंगलुरु को 6 रन से हराने में सफल रही। हालांकि, तीसरे मुकाबले में उसे किंग्स इलेवन पंजाब के हाथों 8 विकेट से हार झेलनी पड़ी थी।
चेन्नई के खिलाड़ी बेहतर फॉर्म में
चेन्नई की टीम अच्छी फॉर्म में है। उसका हर खिलाड़ी अपने तरीके से टीम के प्रदर्शन में योगदान दे रहा है। पिछले मैच में धोनी ने शानदार पारी खेलकर टीम की जीत की नींव रखी थी। बल्लेबाजी में उसके पास शेन वाटसन, सुरेश रैना, केदार जाधव और अंबाती रायडू जैसे अनुभवी और मैच का रुख मोड़ देने वाले खिलाड़ी हैं।
मुंबई के पास मैच विनर खिलाड़ी, लेकिन वे लय में नहीं
मुंबई की बात की जाए तो उसकी टीम में वह तालमेल नहीं दिखा है जो उसके पास मौजूद है। मैदान पर उसके खिलाड़ी लय में नहीं दिखे हैं। बल्लेबाजी में दक्षिण अफ्रीका के क्विंटन डीकॉक ही कुछ कमाल दिखा पाए हैं। रोहित शर्मा, कीरोन पोलार्ड का बल्ला खामोश रहा है। युवराज सिंह ने अपनी पुरानी फॉर्म की झलक जरूर दिखाई है, लेकिन वे अंत तक विकेट पर टिकने में असफल रहे हैं।
दोनों टीमें
मुंबई इंडियंस : रोहित शर्मा (कप्तान), जसप्रीत बुमराह, हार्दिक पंड्या, क्रुणाल पंड्या, युवराज सिंह, कीरोन पोलार्ड, लसिथ मलिंगा, राहुल चाहर, बेन कटिंग, पंकज जायसवाल, इशान किशन, सिद्धेश लाड, इविन लेविस, मयंक मार्कंडेय, मिशेल मैकक्लेनघन, अलजारी जोसेफ, जेसन बेहरेनडॉर्फ, अंकुल रॉय, रासिख सलाम, अनमोलप्रीत सिंह, बरिंदर सरन, आदित्य तारे, सूर्य कुमार यादव, जयंत यादव, क्विंटन डिकॉक।
चेन्नई सुपरकिंग्स : महेंद्र सिंह धोनी (कप्तान), सुरेश रैना, अंबाती रायडू, शेन वाटसन, फाफ डुप्लेसिस, मुरली विजय, केदार जाधव, सैम बिलिंग्स, रविंद्र जडेजा, ध्रुव शोरे, चैतन्य बिश्नोई, रितुराज गायकवाड़, ड्वेन ब्रावो, कर्ण शर्मा, इमरान ताहिर, हरभजन सिंह, मिशेल सैंटनर, शार्दुल ठाकुर, मोहित शर्मा, केएम आसिफ, दीपक चाहर, एन. जगदीशन, स्कॉट कुग्गेलेइजन।
Thursday, March 21, 2019
सरयू नदी में एक ही परिवार के 5 छात्रों की डूबकर मौत, सभी होली मनाने घर आए थे
गोरखपुर. यहां के बेलघाट इलाके में सरयू नदी में बुधवार शाम नहाने पांच छात्रों की डूबकर मौत हो गई। देर रात तक सभी शव बरामद कर लिए गए। सभी छात्र होली मनाने के लिए घर आए थे।
बेइली खुर्द गांव निवासी कृष्णमुरारी शुक्ल का 14 वर्षीय बेटा सत्यम 8वीं का छात्र था। उनके भाई मदन मुरारी शुक्ल का 19 वर्षीय बेटा बीएससी का छात्र था। दोनों गोरखपुर से तीन दिन पहले होली की छुट्टी पर घर आए थे। गांव के ही ध्रुवनारायण शुक्ला का 16 वर्षीय बेटा नितेश भी होली पर ही गांव गया था। ध्रुवनारायण के भाई दिनेश शुक्ल का बेटा 17 वर्षीय बेटा अमन बेलघाट में इंटरमीडिएट का छात्र था। उरुवा थाना क्षेत्र स्थित परसा तिवारी निवासी सूर्यपति त्रिपाठी का 18 वर्षीय बेटा आदर्श मुंबई में मेडिकल का छात्र था। दो दिन पहले वह भी अपने ननिहाल मदन शुक्ल के घर गया था।
लोग ढूंढते हुए सरयू नदी के पास पहुंचे
बुधवार दोपहर बाद पांचों छात्र घर से घूमने निकले थे। देर शाम तक जब वे घर नहीं लौटे तो परिजन को चिंता हुई। ग्रामीण उन्हें ढूंढते हुए गांव से करीब 500 मीटर दूरी पर सरयू नदी के किनारे पहुंचे। लोगों ने किशोरों के मोबाइल नंबर डायल किए तो घंटी सुनाई दी। मोबाइल ढूंढा तो पास ही पांचों युवकों के कपड़े पड़े थे। कपड़ों में ही उनके मोबाइल भी थे। लोग परेशान हो गए। यह आशंका हुई कि सभी किशोर नदी में स्नान करने गए होंगे और डूब गए होंगे।
गांव के कुछ लोग जाल लेकर नदी में उतर गए। पुलिस जब तक मौके पर पहुंचती और गोताखोरों को बुलवाती, ग्रामीणों ने सत्यम की लाश बरामद कर ली। देर रात तक सभी लाशें नदी में मिल गईं।
क्राइस्टचर्च. न्यूजीलैंड की दो मस्जिदों में पिछले दिनों हुए कत्लेआम के बाद सरकार ने हथियार नीति में बदलाव किया। गुरुवार को प्रधानमंत्री जेसिंडा आर्डर्न ने कहा कि न्यूजीलैंड में सभी तरह के सेमी ऑटोमैटिक हथियारों पर प्रतिबंध लगाया गया है। इसके अलावा सभी असॉल्ट राइफलों की बिक्री पर रोक होगी। जेसिंडा ने कहा कि इनमें ऐसे हथियार भी फायर आर्म्स भी शामिल हैं, जिन्हें सेमी ऑटोमैटिक हथियारों में बदला जा सकता है।
क्राइस्टचर्च स्थित अल-नूर और लिनवुड मस्जिद में बीते शुक्रवार (15 मार्च) को हुए हमले में 50 लोगो मारे गए थे। इनमें 8 भारतीय थे। हमलावर ब्रेंटन टैरेंट (28) ने नमाज के दौरान लोगों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाई थीं। इस दौरान 50 से ज्यादा लोग जख्मी भी हुए थे। इसमें बांग्लादेश क्रिकेट टीम के खिलाड़ी भी बाल-बाल बच गए थे। दुनियाभर में हमले की निंदा की गई। आतंकी हमले के बाद प्रधानमंत्री आर्डर्न ने गन कानून में बदलाव करने की बात कही थी।
पहली पेशी में कोर्ट में हंस रहा था टैरेंट
ऑस्ट्रेलियाई मूल के आरोपी ब्रेंटन को शनिवार को कोर्ट में पेश किया गया था। उसे 5 अप्रैल तक हिरासत में भेजा गया। पहली पेशी में टैरेंट को हथकड़ी लगी हुई थी। इस दौरान वह पूरे समय मुस्कुराता दिखा था। कुछ देर मीडिया की तरफ बनावटी हंसी में उसने सबकुछ ठीक होने का इशारा किया। हत्यारे के बचाव के लिए सरकारी वकील साथ गए थे, लेकिन उसने अपने वकील को हटाकर खुद केस लड़ने का फैसला किया। टैरेंट ने कोर्ट में खुद को फासिस्ट बताया और जमानत के लिए आग्रह भी नहीं किया।
बेइली खुर्द गांव निवासी कृष्णमुरारी शुक्ल का 14 वर्षीय बेटा सत्यम 8वीं का छात्र था। उनके भाई मदन मुरारी शुक्ल का 19 वर्षीय बेटा बीएससी का छात्र था। दोनों गोरखपुर से तीन दिन पहले होली की छुट्टी पर घर आए थे। गांव के ही ध्रुवनारायण शुक्ला का 16 वर्षीय बेटा नितेश भी होली पर ही गांव गया था। ध्रुवनारायण के भाई दिनेश शुक्ल का बेटा 17 वर्षीय बेटा अमन बेलघाट में इंटरमीडिएट का छात्र था। उरुवा थाना क्षेत्र स्थित परसा तिवारी निवासी सूर्यपति त्रिपाठी का 18 वर्षीय बेटा आदर्श मुंबई में मेडिकल का छात्र था। दो दिन पहले वह भी अपने ननिहाल मदन शुक्ल के घर गया था।
लोग ढूंढते हुए सरयू नदी के पास पहुंचे
बुधवार दोपहर बाद पांचों छात्र घर से घूमने निकले थे। देर शाम तक जब वे घर नहीं लौटे तो परिजन को चिंता हुई। ग्रामीण उन्हें ढूंढते हुए गांव से करीब 500 मीटर दूरी पर सरयू नदी के किनारे पहुंचे। लोगों ने किशोरों के मोबाइल नंबर डायल किए तो घंटी सुनाई दी। मोबाइल ढूंढा तो पास ही पांचों युवकों के कपड़े पड़े थे। कपड़ों में ही उनके मोबाइल भी थे। लोग परेशान हो गए। यह आशंका हुई कि सभी किशोर नदी में स्नान करने गए होंगे और डूब गए होंगे।
गांव के कुछ लोग जाल लेकर नदी में उतर गए। पुलिस जब तक मौके पर पहुंचती और गोताखोरों को बुलवाती, ग्रामीणों ने सत्यम की लाश बरामद कर ली। देर रात तक सभी लाशें नदी में मिल गईं।
क्राइस्टचर्च. न्यूजीलैंड की दो मस्जिदों में पिछले दिनों हुए कत्लेआम के बाद सरकार ने हथियार नीति में बदलाव किया। गुरुवार को प्रधानमंत्री जेसिंडा आर्डर्न ने कहा कि न्यूजीलैंड में सभी तरह के सेमी ऑटोमैटिक हथियारों पर प्रतिबंध लगाया गया है। इसके अलावा सभी असॉल्ट राइफलों की बिक्री पर रोक होगी। जेसिंडा ने कहा कि इनमें ऐसे हथियार भी फायर आर्म्स भी शामिल हैं, जिन्हें सेमी ऑटोमैटिक हथियारों में बदला जा सकता है।
क्राइस्टचर्च स्थित अल-नूर और लिनवुड मस्जिद में बीते शुक्रवार (15 मार्च) को हुए हमले में 50 लोगो मारे गए थे। इनमें 8 भारतीय थे। हमलावर ब्रेंटन टैरेंट (28) ने नमाज के दौरान लोगों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाई थीं। इस दौरान 50 से ज्यादा लोग जख्मी भी हुए थे। इसमें बांग्लादेश क्रिकेट टीम के खिलाड़ी भी बाल-बाल बच गए थे। दुनियाभर में हमले की निंदा की गई। आतंकी हमले के बाद प्रधानमंत्री आर्डर्न ने गन कानून में बदलाव करने की बात कही थी।
पहली पेशी में कोर्ट में हंस रहा था टैरेंट
ऑस्ट्रेलियाई मूल के आरोपी ब्रेंटन को शनिवार को कोर्ट में पेश किया गया था। उसे 5 अप्रैल तक हिरासत में भेजा गया। पहली पेशी में टैरेंट को हथकड़ी लगी हुई थी। इस दौरान वह पूरे समय मुस्कुराता दिखा था। कुछ देर मीडिया की तरफ बनावटी हंसी में उसने सबकुछ ठीक होने का इशारा किया। हत्यारे के बचाव के लिए सरकारी वकील साथ गए थे, लेकिन उसने अपने वकील को हटाकर खुद केस लड़ने का फैसला किया। टैरेंट ने कोर्ट में खुद को फासिस्ट बताया और जमानत के लिए आग्रह भी नहीं किया।
Thursday, February 28, 2019
11.8 लाख वनवासियों को राहत, SC ने अपने ही आदेश पर लगाई रोक
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को 21 राज्यों को 11.8 लाख वनवासियों और आदिवासियों को बेदखल करने संबंधी अपने ही 13 फरवरी के आदेश पर रोक लगा दी है. जंगल की जमीन पर इन वनवासियों के दावे अधिकारियों ने अस्वीकार कर दिए थे.
न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा और न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा की पीठ ने इन राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वे वनवासियों के दावे अस्वीकार करने के लिए अपनायी गई प्रक्रिया के विवरण के साथ हलफनामे कोर्ट में दाखिल करें. पीठ इस मामले में अब 30 जुलाई को आगे सुनवाई करेगी.
दरअसल सुप्रीम कोर्ट बुधवार को 13 फरवरी के अपने आदेश पर रोक लगाने के केन्द्र सरकार के अनुरोध पर विचार के लिए सहमत हो गई थी. कोर्ट ने इस आदेश के तहत 21 राज्यों से कहा था कि करीब 11.8 लाख उन वनवासियों (आदिवासियों) को बेदखल किया जाए, जिनके दावे अस्वीकार कर दिए गए हैं.
पीठ ने आज सुनवाई के बाद कहा, 'हम अपने 13 फरवरी के आदेश पर रोक लगा रहे हैं. पीठ ने कहा कि वनवासियों को बेदखल करने के लिए उठाए गए तमाम कदमों के विवरण के साथ राज्यों के मुख्य सचिवों को हलफनामे दाखिल करने होंगे.'
केन्द्र ने 13 फरवरी के आदेश में सुधार का अनुरोध करते हुए कोर्ट से कहा कि अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) कानून, 2016 लाभ देने संबंधी कानून है. क्योंकि ये लोग बेहद गरीब और निरक्षर हैं, जिन्हें अपने अधिकारों और कानूनी प्रक्रिया की जानकारी नहीं है, इसलिए इनकी मदद के लिए उदारता अपनाई जानी चाहिए.
गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की थी कि 11.9 लाख वनवासी जनजातियों (एफडीएसटी) और अन्य पारंपरिक वनवासियों (ओटीएफडी) को जंगलों से निकालने के आदेश पर रोक लगाने संबंधी याचिका पर तुरंत सुनवाई करे. इन लोगों के जंगल में रहने के अधिकार से जुड़े दावों को राज्य सरकारों ने खारिज कर दिया था.
मध्य प्रदेश की प्रियंका भदोरिया ने शादी से पहले ससुराल वालों के सामने एक ऐसी डिमांड रख दी जिसे सुनकर सबके कान खड़े हो गए.
प्रियंका ने अपने ससुराल वालों से साफ कह दिया कि जब तक वे 10 हजार पौधे नहीं लगाएंगे, वो शादी नहीं करेंगी. ससुराल वालों को ये सुनना थोड़ा अजीब जरूर लगा लेकिन उन्होंने प्रियंका की मांग मान ली और बीते शुक्रवार घूमधाम से उन्होंने प्रियंका के साथ अपने बेटे की शादी करवा दी.
प्रियंका भिंड के किशीपुरा गांव की रहने वाली हैं. जहां शादी से पहले दुल्हन से पूछा जाता है कि उसे क्या चाहिए. आमतौर पर लड़कियां गहने, कपड़े मांगती हैं वहीं प्रियंका ने ये सबकुछ नहीं मांगकर, पेड़ लगाने की शर्त रखी.
प्रियंका 10 साल की उम्र से पौधे लगा रही है और इसे इत्तेफाक ही कहेंगे कि उनकी शादी भी इंटरनेशनल अर्थ डे के दिन ही हुई.
प्रियंका के पति रवि चौहान भी अपनी पत्नी की सूझबूझ से काफी खुश है. उन्हें खुशी है कि उनकी पत्नी पर्यावरण के प्रति इतनी सजग हैं. प्रियंका चाहती हैं कि 10 हजार पौधे की शर्त में से पांच हजार पौधे उनके मायके में लगाए जाएं और पांच हजार उनके ससुराल में. आज जहां देश का एक बड़ा हिस्सा सूखे से प्रभावित है ऐसे में प्रियंका की ये पहल वाकई एक जरूरी और बेहतरीन प्रयास है.
न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा और न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा की पीठ ने इन राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वे वनवासियों के दावे अस्वीकार करने के लिए अपनायी गई प्रक्रिया के विवरण के साथ हलफनामे कोर्ट में दाखिल करें. पीठ इस मामले में अब 30 जुलाई को आगे सुनवाई करेगी.
दरअसल सुप्रीम कोर्ट बुधवार को 13 फरवरी के अपने आदेश पर रोक लगाने के केन्द्र सरकार के अनुरोध पर विचार के लिए सहमत हो गई थी. कोर्ट ने इस आदेश के तहत 21 राज्यों से कहा था कि करीब 11.8 लाख उन वनवासियों (आदिवासियों) को बेदखल किया जाए, जिनके दावे अस्वीकार कर दिए गए हैं.
पीठ ने आज सुनवाई के बाद कहा, 'हम अपने 13 फरवरी के आदेश पर रोक लगा रहे हैं. पीठ ने कहा कि वनवासियों को बेदखल करने के लिए उठाए गए तमाम कदमों के विवरण के साथ राज्यों के मुख्य सचिवों को हलफनामे दाखिल करने होंगे.'
केन्द्र ने 13 फरवरी के आदेश में सुधार का अनुरोध करते हुए कोर्ट से कहा कि अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) कानून, 2016 लाभ देने संबंधी कानून है. क्योंकि ये लोग बेहद गरीब और निरक्षर हैं, जिन्हें अपने अधिकारों और कानूनी प्रक्रिया की जानकारी नहीं है, इसलिए इनकी मदद के लिए उदारता अपनाई जानी चाहिए.
गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की थी कि 11.9 लाख वनवासी जनजातियों (एफडीएसटी) और अन्य पारंपरिक वनवासियों (ओटीएफडी) को जंगलों से निकालने के आदेश पर रोक लगाने संबंधी याचिका पर तुरंत सुनवाई करे. इन लोगों के जंगल में रहने के अधिकार से जुड़े दावों को राज्य सरकारों ने खारिज कर दिया था.
मध्य प्रदेश की प्रियंका भदोरिया ने शादी से पहले ससुराल वालों के सामने एक ऐसी डिमांड रख दी जिसे सुनकर सबके कान खड़े हो गए.
प्रियंका ने अपने ससुराल वालों से साफ कह दिया कि जब तक वे 10 हजार पौधे नहीं लगाएंगे, वो शादी नहीं करेंगी. ससुराल वालों को ये सुनना थोड़ा अजीब जरूर लगा लेकिन उन्होंने प्रियंका की मांग मान ली और बीते शुक्रवार घूमधाम से उन्होंने प्रियंका के साथ अपने बेटे की शादी करवा दी.
प्रियंका भिंड के किशीपुरा गांव की रहने वाली हैं. जहां शादी से पहले दुल्हन से पूछा जाता है कि उसे क्या चाहिए. आमतौर पर लड़कियां गहने, कपड़े मांगती हैं वहीं प्रियंका ने ये सबकुछ नहीं मांगकर, पेड़ लगाने की शर्त रखी.
प्रियंका 10 साल की उम्र से पौधे लगा रही है और इसे इत्तेफाक ही कहेंगे कि उनकी शादी भी इंटरनेशनल अर्थ डे के दिन ही हुई.
प्रियंका के पति रवि चौहान भी अपनी पत्नी की सूझबूझ से काफी खुश है. उन्हें खुशी है कि उनकी पत्नी पर्यावरण के प्रति इतनी सजग हैं. प्रियंका चाहती हैं कि 10 हजार पौधे की शर्त में से पांच हजार पौधे उनके मायके में लगाए जाएं और पांच हजार उनके ससुराल में. आज जहां देश का एक बड़ा हिस्सा सूखे से प्रभावित है ऐसे में प्रियंका की ये पहल वाकई एक जरूरी और बेहतरीन प्रयास है.
Wednesday, January 30, 2019
न्यूनतम आय की गारंटी, बीजेपी सोचती रह गई और राहुल खेल गए दांव
"हम एक ऐतिहासिक फैसला लेने जा रहे हैं, जो दुनिया की किसी भी सरकार ने नहीं लिया है. 2019 का चुनाव जीतने के बाद देश के हर गरीब को कांग्रेस पार्टी की सरकार न्यूनतम आमदनी गारंटी देगी. हर गरीब व्यक्ति के बैंक खाते में न्यूनतम आमदनी रहेगी." ये शब्द हैं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के जो उन्होंने छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में सोमवार को कहे. यह बयान महज शब्दों का जाल लग सकता है लेकिन इसके संकेत दूरगामी हैं. दूरगामी इसलिए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी बीजेपी जिस 'गारंटी' के बारे में मंथन ही करती रह गई, राहुल गांधी उसमें से घी निकालने का जुगाड़ कर बैठे.
गारंटी की बात कर कांग्रेस अध्यक्ष ने छत्तीसगढ़ में जिस मुद्दे को उठाया है, उसे अधिकांश जनता की दुखती रग कह सकते हैं. भारत जैसे देश में ऐसे लोगों की बहुलता है जो असंगठित रोजगार की मार झेल रहे हैं. ऐसे में राहुल गांधी ने 'न्यूनतम रोजगार गारंटी' की बात कर उस जमात को साधने की कोशिश की है, जो दिन भर काम करने के बाद शाम के समय खुद को ठगा महसूस करता है. यहां गौर करने वाली बात ये है कि कांग्रेस की सरकार ने ही मनरेगा की शुरुआत की, जिसे गांव-देहात के लिए क्रांतिकारी योजना माना जाता है. यह अलग बात है कि उसे भ्रष्टाचार के घुन ने दूर तक खोखला किया है, लेकिन एक बड़ी तादाद मनरेगा पर आश्रित है, इसमें कोई संदेह नहीं. एक समय मनरेगा का विरोध करने वाले नरेंद्र मोदी ने मनरेगा का बजट बढ़ाया ही, कम नहीं किया. हां, बीजेपी सरकार यह दावा करती रही है कि उसके कार्यकाल में इस स्कीम में भ्रष्टाचार कम हुआ है.
कांग्रेस के युवा अध्यक्ष की उपरोक्त बातों में 'न्यूनतम रोजगार गारंटी' के अलावा एक शब्द और अहम है-'बैंक खाते में न्यूनतम आमदनी'. राजनीतिक दृष्टि से गारंटी और न्यूनतम आमदनी को कांग्रेस का बड़ा मास्टस्ट्रोक मान सकते हैं क्योंकि बात जब बैंक खाते और उसमें न्यूनतम आमदनी की होती है तो लोगों के जहन में '15 लाख रुपए' कौंध जाते हैं. लोगों के दिलोदिमाग पर जनधन खाते भी चक्करघिन्नी बनकर नाच उठते हैं क्योंकि गरीबों के लिए शुरू किए गए खाते का आज हश्र क्या है, किसी से छिपा नहीं. राहुल गांधी सोमवार को छत्तीसगढ़ में जब अपनी बात रख रहे थे तो बेशक उनके दिमाग में लोगों के वे आरोप रहे होंगे जिन्हें 'बीजेपी का जुमला (खाते में 15 लाख रुपए)' कहा जाता रहा है.
छत्तीसगढ़ से ही किया था कर्जमाफी का ऐलान
कांग्रेस के लिए शुभ घड़ी ये भी है कि छत्तीसगढ़ से राहुल गांधी ने किसानों की कर्जमाफी का ऐलान किया और बीजेपी नीत रमन सरकार का सूपड़ा साफ हो गया. ठीक वैसे ही कांग्रेस को भरोसा है कि न्यूनतम आय की गारंटी देकर छत्तीसगढ़ में किसानों-मजदूरों का दिल जीता जा सकता है. तभी राहुल गांधी ने पूरे दमखम से कहा कि "कांग्रेस ने कर्जमाफी, जमीन वापसी का वादा पूरा किया. पैसे की कोई कमी नहीं है. हम दो हिंदुस्तान नहीं चाहते. बीजेपी दो हिंदुस्तान बनाना चाहती है. एक हिंदुस्तान उद्योगपतियों का, जहां सब कुछ मिल सकता है और दूसरा गरीब किसानों का हिंदुस्तान, जहां कुछ नहीं मिलेगा, सिर्फ 'मन की बात' सुनने को मिलेगी." इन्हीं बातों को पुष्ट करने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष कई महीनों से देश के कोने-कोने में घूमकर लोगों को बताने की कोशिश कर रहे हैं कि मौजूदा मोदी सरकार गरीब विरोधी है जबकि कांग्रेस गरीबों-मजदूरों की हितैषी है.
आगे क्या करेगी कांग्रेस?
राहुल गांधी ने छत्तीसगढ़ के मंच से आमदनी गारंटी की बात कर अपनी चुनावी फिल्म का ट्रेलर दिखा दिया है. आगे तय है कि पार्टी अपने घोषणा पत्र में गारंटी योजना लागू करने का ऐलान करेगी और बताएगी कि यह गरीबों की दशा बदलने वाला क्रांतिकारी कदम होगा. भले आप कह लें कि पार्टियों की घोषणाओं में हवा-हवाई बातें ज्यादा होती हैं जिन पर लोग भरोसा कम और सवाल ज्यादा उठाते हैं. मगर हाल में बीते विधानसभा चुनावों का लब्बोलुआब यही है कि घोषणाएं अगर गंभीर हों, गरीब-गुरबा की संवेदना को छूने वाली हों तो लोग भरोसा करते हैं और पार्टियों को वोट मिलते हैं. लिहाजा कांग्रेस अगर गारंटी योजना घोषणा पत्र में लाती है तो इसमें कोई हैरत नहीं.
क्यों पिछड़ गई मोदी सरकार?
सवाल है कि जो ऐलान आज राहुल गांधी कर रहे हैं, उसमें मोदी सरकार कैसे पिछड़ गई? यह यक्ष प्रश्न इसलिए भी गंभीर है क्योंकि 2016-17 की आर्थिक समीक्षा में सार्वभौमिक मूलभूत आय या यूनिवर्सल बेसिक इनकम (यूबीआई) का विचार सामने रखा गया था. आज की तारीख से जोड़ें तो दो साल पहले यह अवधारणा मोदी सरकार के दिमाग में थी लेकिन इसमें कहां चूक हुई, यह विचार-विमर्श का विषय है. अब मोदी सरकार यूबीआई को आगे बढ़ाती भी है तो उसपर 'कॉपीकैट' का चस्पा लगेगा और यही कहा जाएगा कि कांग्रेस का विचार आगे बढ़ाने में मोदी सरकार माहिर है.
दिलचस्प बात ये भी है कि 2016-17 की आर्थिक समीक्षा में यूबीआई की बात करते हुए ‘यूनिवर्सल बेसिक इनकमः अ कन्वर्सेशन विद एंड विदइन द महात्मा’ शीर्षक वाला एक पूरा चैप्टर इसमें जोड़ा गया था और याद दिलाया गया था कि अति गरीब लोगों के हितों की रक्षा करना राष्ट्र राज्य की जिम्मेदारी है जिसमें ऐसे कदम लाभदायक होंगे.
कांग्रेस और राहुल गांधी से कुछ सवाल
इसमें कोई दो राय नहीं कि कांग्रेस और राहुल गांधी की झंडाबरदारी में यूनिवर्सल बेसिक इनकम यानी यूबीआई शुरू होती है तो इससे लोगों में अच्छा संकेत जाएगा लेकिन इसे अमली जामा पहनाने का साधन क्या होगा? इस योजना का ढांचा कुछ ऐसा है कि गरीबों के खाते में एक न्यूनतम राशि ट्रांसफर की जाएगी. अब सवाल है कि कांग्रेस जब जनधन खाते और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) जैसी योजनाओं को कोसती रही है, फिर वह यूबीआई को धरातल पर कैसे उतार पाएगी? क्या देश में फिर नए बैंक खाते खोलने के दौर शुरू होंगे, क्या डीबीटी से इतर कोई नया सिस्टम बनेगा? अगर यह सब हो भी जाता है तो उस भ्रष्टाचार पर अंकुश कैसे लगेगा जिसकी चर्चा मनरेगा में होती है. क्या लोग मनरेगा की तरह काम-धाम छोड़ कर खैरात पर निर्भर नहीं होंगे? अगर मुफ्त खाते में पैसे आ जाएं तो बिना मेहनत मजदूरी किए शराब पीने का चलन फिर नहीं बढ़ेगा और महिलाएं जो मजदूरी करती हैं, उनके घर बैठने का सिलसिला शुरू नहीं होगा?
गारंटी की बात कर कांग्रेस अध्यक्ष ने छत्तीसगढ़ में जिस मुद्दे को उठाया है, उसे अधिकांश जनता की दुखती रग कह सकते हैं. भारत जैसे देश में ऐसे लोगों की बहुलता है जो असंगठित रोजगार की मार झेल रहे हैं. ऐसे में राहुल गांधी ने 'न्यूनतम रोजगार गारंटी' की बात कर उस जमात को साधने की कोशिश की है, जो दिन भर काम करने के बाद शाम के समय खुद को ठगा महसूस करता है. यहां गौर करने वाली बात ये है कि कांग्रेस की सरकार ने ही मनरेगा की शुरुआत की, जिसे गांव-देहात के लिए क्रांतिकारी योजना माना जाता है. यह अलग बात है कि उसे भ्रष्टाचार के घुन ने दूर तक खोखला किया है, लेकिन एक बड़ी तादाद मनरेगा पर आश्रित है, इसमें कोई संदेह नहीं. एक समय मनरेगा का विरोध करने वाले नरेंद्र मोदी ने मनरेगा का बजट बढ़ाया ही, कम नहीं किया. हां, बीजेपी सरकार यह दावा करती रही है कि उसके कार्यकाल में इस स्कीम में भ्रष्टाचार कम हुआ है.
कांग्रेस के युवा अध्यक्ष की उपरोक्त बातों में 'न्यूनतम रोजगार गारंटी' के अलावा एक शब्द और अहम है-'बैंक खाते में न्यूनतम आमदनी'. राजनीतिक दृष्टि से गारंटी और न्यूनतम आमदनी को कांग्रेस का बड़ा मास्टस्ट्रोक मान सकते हैं क्योंकि बात जब बैंक खाते और उसमें न्यूनतम आमदनी की होती है तो लोगों के जहन में '15 लाख रुपए' कौंध जाते हैं. लोगों के दिलोदिमाग पर जनधन खाते भी चक्करघिन्नी बनकर नाच उठते हैं क्योंकि गरीबों के लिए शुरू किए गए खाते का आज हश्र क्या है, किसी से छिपा नहीं. राहुल गांधी सोमवार को छत्तीसगढ़ में जब अपनी बात रख रहे थे तो बेशक उनके दिमाग में लोगों के वे आरोप रहे होंगे जिन्हें 'बीजेपी का जुमला (खाते में 15 लाख रुपए)' कहा जाता रहा है.
छत्तीसगढ़ से ही किया था कर्जमाफी का ऐलान
कांग्रेस के लिए शुभ घड़ी ये भी है कि छत्तीसगढ़ से राहुल गांधी ने किसानों की कर्जमाफी का ऐलान किया और बीजेपी नीत रमन सरकार का सूपड़ा साफ हो गया. ठीक वैसे ही कांग्रेस को भरोसा है कि न्यूनतम आय की गारंटी देकर छत्तीसगढ़ में किसानों-मजदूरों का दिल जीता जा सकता है. तभी राहुल गांधी ने पूरे दमखम से कहा कि "कांग्रेस ने कर्जमाफी, जमीन वापसी का वादा पूरा किया. पैसे की कोई कमी नहीं है. हम दो हिंदुस्तान नहीं चाहते. बीजेपी दो हिंदुस्तान बनाना चाहती है. एक हिंदुस्तान उद्योगपतियों का, जहां सब कुछ मिल सकता है और दूसरा गरीब किसानों का हिंदुस्तान, जहां कुछ नहीं मिलेगा, सिर्फ 'मन की बात' सुनने को मिलेगी." इन्हीं बातों को पुष्ट करने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष कई महीनों से देश के कोने-कोने में घूमकर लोगों को बताने की कोशिश कर रहे हैं कि मौजूदा मोदी सरकार गरीब विरोधी है जबकि कांग्रेस गरीबों-मजदूरों की हितैषी है.
आगे क्या करेगी कांग्रेस?
राहुल गांधी ने छत्तीसगढ़ के मंच से आमदनी गारंटी की बात कर अपनी चुनावी फिल्म का ट्रेलर दिखा दिया है. आगे तय है कि पार्टी अपने घोषणा पत्र में गारंटी योजना लागू करने का ऐलान करेगी और बताएगी कि यह गरीबों की दशा बदलने वाला क्रांतिकारी कदम होगा. भले आप कह लें कि पार्टियों की घोषणाओं में हवा-हवाई बातें ज्यादा होती हैं जिन पर लोग भरोसा कम और सवाल ज्यादा उठाते हैं. मगर हाल में बीते विधानसभा चुनावों का लब्बोलुआब यही है कि घोषणाएं अगर गंभीर हों, गरीब-गुरबा की संवेदना को छूने वाली हों तो लोग भरोसा करते हैं और पार्टियों को वोट मिलते हैं. लिहाजा कांग्रेस अगर गारंटी योजना घोषणा पत्र में लाती है तो इसमें कोई हैरत नहीं.
क्यों पिछड़ गई मोदी सरकार?
सवाल है कि जो ऐलान आज राहुल गांधी कर रहे हैं, उसमें मोदी सरकार कैसे पिछड़ गई? यह यक्ष प्रश्न इसलिए भी गंभीर है क्योंकि 2016-17 की आर्थिक समीक्षा में सार्वभौमिक मूलभूत आय या यूनिवर्सल बेसिक इनकम (यूबीआई) का विचार सामने रखा गया था. आज की तारीख से जोड़ें तो दो साल पहले यह अवधारणा मोदी सरकार के दिमाग में थी लेकिन इसमें कहां चूक हुई, यह विचार-विमर्श का विषय है. अब मोदी सरकार यूबीआई को आगे बढ़ाती भी है तो उसपर 'कॉपीकैट' का चस्पा लगेगा और यही कहा जाएगा कि कांग्रेस का विचार आगे बढ़ाने में मोदी सरकार माहिर है.
दिलचस्प बात ये भी है कि 2016-17 की आर्थिक समीक्षा में यूबीआई की बात करते हुए ‘यूनिवर्सल बेसिक इनकमः अ कन्वर्सेशन विद एंड विदइन द महात्मा’ शीर्षक वाला एक पूरा चैप्टर इसमें जोड़ा गया था और याद दिलाया गया था कि अति गरीब लोगों के हितों की रक्षा करना राष्ट्र राज्य की जिम्मेदारी है जिसमें ऐसे कदम लाभदायक होंगे.
कांग्रेस और राहुल गांधी से कुछ सवाल
इसमें कोई दो राय नहीं कि कांग्रेस और राहुल गांधी की झंडाबरदारी में यूनिवर्सल बेसिक इनकम यानी यूबीआई शुरू होती है तो इससे लोगों में अच्छा संकेत जाएगा लेकिन इसे अमली जामा पहनाने का साधन क्या होगा? इस योजना का ढांचा कुछ ऐसा है कि गरीबों के खाते में एक न्यूनतम राशि ट्रांसफर की जाएगी. अब सवाल है कि कांग्रेस जब जनधन खाते और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) जैसी योजनाओं को कोसती रही है, फिर वह यूबीआई को धरातल पर कैसे उतार पाएगी? क्या देश में फिर नए बैंक खाते खोलने के दौर शुरू होंगे, क्या डीबीटी से इतर कोई नया सिस्टम बनेगा? अगर यह सब हो भी जाता है तो उस भ्रष्टाचार पर अंकुश कैसे लगेगा जिसकी चर्चा मनरेगा में होती है. क्या लोग मनरेगा की तरह काम-धाम छोड़ कर खैरात पर निर्भर नहीं होंगे? अगर मुफ्त खाते में पैसे आ जाएं तो बिना मेहनत मजदूरी किए शराब पीने का चलन फिर नहीं बढ़ेगा और महिलाएं जो मजदूरी करती हैं, उनके घर बैठने का सिलसिला शुरू नहीं होगा?
Tuesday, January 22, 2019
3 में से सिर्फ 1 किसान को मिलता है कर्जमाफी का फायदा, चौंका देगी ये रिपोर्ट
राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा की विधानसभा चुनावों में हार और बीते वर्ष देश के कई हिस्सों में किसान आंदोलन के चलते कृषि क्षेत्र की चुनौतियां राष्ट्रीय मुद्दा बना. यह जरूरी भी था क्योंकि कृषि क्षेत्र देश में कुल रोजगार का 49 फीसदी है और देश की लगभग 70 फीसदी जनसंख्या इसपर आधारित है.
इस सच्चाई के बावजूद कृषि क्षेत्र हाशिए पर रहा है. वहीं मौजूदा समय में भी ये मुद्दा राजनीतिक लाभ और लोकलुभावन नीतियों के चलते किसान कर्जमाफी, अधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य और हाल ही में तेलंगाना के रायथू बंधु स्कीम इर्दगिर्द सीमित है.
हमें समझने की जरूरत है कि किसानों की समस्या रातों-रात नहीं पैदा हुई. नीति आयोग की 2017 की रिपोर्ट, किसानों की आमदनी को दोगुनी करने की पहल समेत कई ऐसी समीक्षा से साफ कि किसानों की समस्या 1991-92 में शुरू हुई. इस समय तक दोनों कृषि और गैर-कृषि क्षेत्रों में समान स्तर पर विकास हो रहा था.
जानें, किसानों को इस भंवर से निकालने के लिए क्या किया गया है.
कर्जमाफी से कुछ किसानों को फायदा, भूमिहीन के लिए बेअसर
कर्जमाफी किसी बिमारी का इलाज नहीं बल्कि कुछ किसानों को तत्काल प्रभाव से राहत पहुंचाने का एक जरिया है. इसका फायदा सिर्फ उन किसानों को मिलता है जिन्होंने संस्थागत कर्ज लिए हैं. पिछला एनएसएसओ सर्व 2013 के मुताबिक देश में 52 फीसदी कृषि परिवार कर्ज में डूबे हैं और इसमें महज 60 फीसदी परिवारों ने किसी संस्था से कर्ज लिया है. लिहाजा, साफ है कि महज 31 फीसदी (52 फीसदी का 60 फीसदी) कृषि परिवारों को कर्जमाफी का फायदा पहुंचने की उम्मीद है.
कमलनाथ ने 'इंडिया टुडे' से बातचीत में कहा, 'बीजेपी मध्य प्रदेश में ऑपरेशन लोटस का प्रयास कर रही है.' उन्होंने कहा कि कांग्रेस के पांच विधायकों से बीजेपी ने संपर्क कर प्रलोभन देने का प्रयास किया था. इसकी जानकारी इन विधायकों ने अपने मुख्यमंत्री को दी है. मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि बीजेपी कांग्रेसी विधायकों को प्रलोभन देकर उन्हें तोड़ने की कोशिश कर रही है ताकि उनकी सरकार को गिराया जा सके.
कमलनाथ ने हालांकि अपने सरकार के प्रति भरोसा जताया है और कहा कि उनकी सरकार को कोई खतरा नहीं है. उन्होंने यह भी दावा किया कि बीजेपी के पांच विधायक उनके संपर्क में हैं. बीजेपी के ये विधायक अपनी पार्टी में अपने भविष्य को लेकर आशंकित हैं. कमलनाथ ने कहा कि यदि बीजेपी उनके विधायकों को तोड़ने का प्रयास करती है तो वह भी वही करेंगे.
कर्नाटक का संकट
बता दें कि कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की सरकार पर उस समय संकट के बादल मंडराने लगे थे, जब दो विधायकों ने सरकार से अपना समर्थन वापस लेने की घोषणा की थी. इसके बाद सवाल उठने लगे थे कि सात महीने पहले कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने जेडीएस के एचडी कुमारस्वामी की सरकार क्या चल पाएगी. असल में, कांग्रेस के कुछ असंतुष्ट विधायकों के मुंबई में बीजेपी नेताओं के संपर्क में होने की सुर्खियों के बाद कयासबाजी का दौर शुरू हो गया था और कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस सरकार को लेकर सवाल उठने लगे थे. कहा जाने लगा था कि बीजेपी कर्नाटक में ऑपरेशन लोटस चला रही है जिसके तहत वह कांग्रेस के असंतुष्ट विधायकों को तोड़कर अपना सरकार बनाना चाहती है. वहीं एचडी कुमारस्वामी को सामने आना पड़ा और यह कहना पड़ा कि उनकी सरकार को कोई खतरा नहीं है.
इस सच्चाई के बावजूद कृषि क्षेत्र हाशिए पर रहा है. वहीं मौजूदा समय में भी ये मुद्दा राजनीतिक लाभ और लोकलुभावन नीतियों के चलते किसान कर्जमाफी, अधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य और हाल ही में तेलंगाना के रायथू बंधु स्कीम इर्दगिर्द सीमित है.
हमें समझने की जरूरत है कि किसानों की समस्या रातों-रात नहीं पैदा हुई. नीति आयोग की 2017 की रिपोर्ट, किसानों की आमदनी को दोगुनी करने की पहल समेत कई ऐसी समीक्षा से साफ कि किसानों की समस्या 1991-92 में शुरू हुई. इस समय तक दोनों कृषि और गैर-कृषि क्षेत्रों में समान स्तर पर विकास हो रहा था.
जानें, किसानों को इस भंवर से निकालने के लिए क्या किया गया है.
कर्जमाफी से कुछ किसानों को फायदा, भूमिहीन के लिए बेअसर
कर्जमाफी किसी बिमारी का इलाज नहीं बल्कि कुछ किसानों को तत्काल प्रभाव से राहत पहुंचाने का एक जरिया है. इसका फायदा सिर्फ उन किसानों को मिलता है जिन्होंने संस्थागत कर्ज लिए हैं. पिछला एनएसएसओ सर्व 2013 के मुताबिक देश में 52 फीसदी कृषि परिवार कर्ज में डूबे हैं और इसमें महज 60 फीसदी परिवारों ने किसी संस्था से कर्ज लिया है. लिहाजा, साफ है कि महज 31 फीसदी (52 फीसदी का 60 फीसदी) कृषि परिवारों को कर्जमाफी का फायदा पहुंचने की उम्मीद है.
कमलनाथ ने 'इंडिया टुडे' से बातचीत में कहा, 'बीजेपी मध्य प्रदेश में ऑपरेशन लोटस का प्रयास कर रही है.' उन्होंने कहा कि कांग्रेस के पांच विधायकों से बीजेपी ने संपर्क कर प्रलोभन देने का प्रयास किया था. इसकी जानकारी इन विधायकों ने अपने मुख्यमंत्री को दी है. मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि बीजेपी कांग्रेसी विधायकों को प्रलोभन देकर उन्हें तोड़ने की कोशिश कर रही है ताकि उनकी सरकार को गिराया जा सके.
कमलनाथ ने हालांकि अपने सरकार के प्रति भरोसा जताया है और कहा कि उनकी सरकार को कोई खतरा नहीं है. उन्होंने यह भी दावा किया कि बीजेपी के पांच विधायक उनके संपर्क में हैं. बीजेपी के ये विधायक अपनी पार्टी में अपने भविष्य को लेकर आशंकित हैं. कमलनाथ ने कहा कि यदि बीजेपी उनके विधायकों को तोड़ने का प्रयास करती है तो वह भी वही करेंगे.
कर्नाटक का संकट
बता दें कि कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की सरकार पर उस समय संकट के बादल मंडराने लगे थे, जब दो विधायकों ने सरकार से अपना समर्थन वापस लेने की घोषणा की थी. इसके बाद सवाल उठने लगे थे कि सात महीने पहले कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने जेडीएस के एचडी कुमारस्वामी की सरकार क्या चल पाएगी. असल में, कांग्रेस के कुछ असंतुष्ट विधायकों के मुंबई में बीजेपी नेताओं के संपर्क में होने की सुर्खियों के बाद कयासबाजी का दौर शुरू हो गया था और कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस सरकार को लेकर सवाल उठने लगे थे. कहा जाने लगा था कि बीजेपी कर्नाटक में ऑपरेशन लोटस चला रही है जिसके तहत वह कांग्रेस के असंतुष्ट विधायकों को तोड़कर अपना सरकार बनाना चाहती है. वहीं एचडी कुमारस्वामी को सामने आना पड़ा और यह कहना पड़ा कि उनकी सरकार को कोई खतरा नहीं है.
Thursday, January 10, 2019
भारतीय टीम के पास वनडे रैंकिंग में इंग्लैंड के करीब पहुंचने का मौका
विराट कोहली और तेज गेंदबाज जसप्रीत बुमराह ICC वनडे रैंकिंग में व्यक्तिगत सूची में शीर्ष पर कायम हैं, लेकिन भारत अगर अपने अगले आठ वनडे मुकाबले जीत लेता है, तो वह टीम रैंकिंग में पहले स्थान पर चल रही इंग्लैंड से महज एक अंक पीछे रह जाएगा. भारत को ऑस्ट्रेलिया से तीन और न्यूजीलैंड से पांच वनडे खेलने हैं जिससे वह 125 अंक तक पहुंच जाएगा और इंग्लैंड से केवल एक अंक पीछे रहेगा, लेकिन ऐसा तभी होगा जब वह अपने सभी आठ मैचों में जीत हासिल कर लेगा जबकि पाकिस्तान को उन्हें पछाड़ने के लिए दक्षिण अफ्रीका को 5-0 से हराना होगा.
इंग्लैंड की टीम तालिका में 126 अंक लेकर शीर्ष पर चल रही है जबकि इस समय भारतीय टीम 121 अंक लेकर दूसरे स्थान पर चल रही है. बल्लेबाजी सूची में कोहली (एक) और रोहित शर्मा (दो) ने अपना स्थान कायम रखा है जबकि बुमराह गेंदबाजों की रैंकिंग में अफगानिस्तान के राशिद खान (दूसरे) और टीम के अपने साथी कुलदीप यादव (तीसरे) से काफी आगे हैं. अन्य भारतीयों में बल्लेबाज शिखर धवन नौंवें स्थान पर हैं जबकि लेग स्पिनर युजवेंद्र चहल इंग्लैंड के आदिल राशिद के साथ संयुक्त छठे स्थान पर हैं.
पंड्या के महिलाओं पर कमेंट को लेकर हरकत में आई BCCI, भेजा नोटिस
वनडे टीम रैंकिंग में न्यूजीलैंड ने श्रीलंका को शिकस्त देकर अपना तीसरा स्थान कायम रखा है. उन्होंने एक अंक हासिल किया जिससे उनके 113 अंक हो गए जबकि श्रीलंका अपने आठवें स्थान पर बना हुआ है, लेकिन वह एक अंक गंवा चुका है जिससे उसके 78 अंक हैं. आपको बता दें कि टीम इंडिया ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ तीन मैचों की वनडे सीरीज का पहला मुकाबला 12 जनवरी को सिडनी में खेलेगी.
सीरीज का दूसरा वनडे एडिलेड में 15 जनवरी को खेला जाएगा और आखिरी वनडे 18 जनवरी को मेलबर्न में खेला जाएगा. टेस्ट में कंगारुओं को पीटने वाली विराट ब्रिगेड के पास वनडे सीरीज जीतकर इतिहास रचने का मौका है. विराट कोहली अगर टीम इंडिया को वनडे सीरीज में भी जीत दिलाते हैं तो वह भारत के पहले ऐसे कप्तान बन जाएंगे जिन्होंने ऑस्ट्रेलिया की धरती पर एक ही दौरे में टेस्ट और बाइलैटरल (द्विपक्षीय) वनडे सीरीज में जीत दर्ज की होगी.
जब नौकरी ही नहीं तो देंगे क्या?
वहीं अपना पक्ष रखते हुए सिब्बल ने कहा कि देश में जितनी नौकरी पैदा नहीं हो रही उससे ज्यादा नौकरी खत्म हो रही है और यह डिजिटल होते भारत की सच्चाई है. सिब्बल ने बताया कि 2001-2019 तक कुल नौकरी 7.3 फीसदी रही और इस हिसाब से सरकार द्वारा नई नौकरी प्रति वर्ष 0.4 फीसदी पैदा की गई. लिहाजा, नई नौकरी और खत्म होती पुरानी नौकरी की ऐसी स्थिति के बीच किस नौकरी को बतौर आरक्षण सरकार देने जा रही है. आंकड़ों का हवाला देते हुए सिब्बल ने कहा कि मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में 45,000 नौकरी दी. लिहाजा, क्या वह अब 10 फीसदी आरक्षण का प्रावधान महज 4,500 लोगों को नौकरी देने के लिए कर रहे हैं.
गरीब नहीं, सामान्य वर्ग की 99 फीसदी आबादी को मिलेगा 10 फीसदी आरक्षण!
सिब्बल ने कहा कि देश नई नौकरी नहीं पैदा कर रहा है. इस देश को आरक्षण नहीं नौकरी चाहिए और नौकरी सिर्फ विकास से आएगी. 7.3 फीसदी की दर से ग्रोथ है फिर भी नौकरी नहीं पैदा हो रही है. सीबीआई, ईडी जैसी जांच एजेंसी को सबके पीछे लगा दिया है तो निवेश कौन और कैसे लाएगा. लिहाजा, सरकार बताए कि उनके पास क्या आंकड़ा है. आखिर क्यों सरकार संविधान में ये संशोधन लेकर आई है. सरकार साफ करे कि क्या संविधान में संशोधन करने का यह तरीका सही है? सिब्बल ने कहा कि जब देश में एससी, एसटी और ओबीसी को ही आरक्षण के मुताबिक नौकरी नहीं दी जा पा रही है तो वह अब 10 फीसदी सामान्य क्ष्रेणी को नौकरी देने का ऐलान कर क्या करने जा रही है? सिब्बल ने कहा कि महज संशोधन बिल लाकर मोदी सरकार बेहद खुश हो रही है लेकिन एक सच्चाई से वह मुंह मोड़ रही है कि असली खुशी जनता को मिलनी चाहिए और क्या उनके इस बिल से जनता .
इंग्लैंड की टीम तालिका में 126 अंक लेकर शीर्ष पर चल रही है जबकि इस समय भारतीय टीम 121 अंक लेकर दूसरे स्थान पर चल रही है. बल्लेबाजी सूची में कोहली (एक) और रोहित शर्मा (दो) ने अपना स्थान कायम रखा है जबकि बुमराह गेंदबाजों की रैंकिंग में अफगानिस्तान के राशिद खान (दूसरे) और टीम के अपने साथी कुलदीप यादव (तीसरे) से काफी आगे हैं. अन्य भारतीयों में बल्लेबाज शिखर धवन नौंवें स्थान पर हैं जबकि लेग स्पिनर युजवेंद्र चहल इंग्लैंड के आदिल राशिद के साथ संयुक्त छठे स्थान पर हैं.
पंड्या के महिलाओं पर कमेंट को लेकर हरकत में आई BCCI, भेजा नोटिस
वनडे टीम रैंकिंग में न्यूजीलैंड ने श्रीलंका को शिकस्त देकर अपना तीसरा स्थान कायम रखा है. उन्होंने एक अंक हासिल किया जिससे उनके 113 अंक हो गए जबकि श्रीलंका अपने आठवें स्थान पर बना हुआ है, लेकिन वह एक अंक गंवा चुका है जिससे उसके 78 अंक हैं. आपको बता दें कि टीम इंडिया ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ तीन मैचों की वनडे सीरीज का पहला मुकाबला 12 जनवरी को सिडनी में खेलेगी.
सीरीज का दूसरा वनडे एडिलेड में 15 जनवरी को खेला जाएगा और आखिरी वनडे 18 जनवरी को मेलबर्न में खेला जाएगा. टेस्ट में कंगारुओं को पीटने वाली विराट ब्रिगेड के पास वनडे सीरीज जीतकर इतिहास रचने का मौका है. विराट कोहली अगर टीम इंडिया को वनडे सीरीज में भी जीत दिलाते हैं तो वह भारत के पहले ऐसे कप्तान बन जाएंगे जिन्होंने ऑस्ट्रेलिया की धरती पर एक ही दौरे में टेस्ट और बाइलैटरल (द्विपक्षीय) वनडे सीरीज में जीत दर्ज की होगी.
जब नौकरी ही नहीं तो देंगे क्या?
वहीं अपना पक्ष रखते हुए सिब्बल ने कहा कि देश में जितनी नौकरी पैदा नहीं हो रही उससे ज्यादा नौकरी खत्म हो रही है और यह डिजिटल होते भारत की सच्चाई है. सिब्बल ने बताया कि 2001-2019 तक कुल नौकरी 7.3 फीसदी रही और इस हिसाब से सरकार द्वारा नई नौकरी प्रति वर्ष 0.4 फीसदी पैदा की गई. लिहाजा, नई नौकरी और खत्म होती पुरानी नौकरी की ऐसी स्थिति के बीच किस नौकरी को बतौर आरक्षण सरकार देने जा रही है. आंकड़ों का हवाला देते हुए सिब्बल ने कहा कि मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में 45,000 नौकरी दी. लिहाजा, क्या वह अब 10 फीसदी आरक्षण का प्रावधान महज 4,500 लोगों को नौकरी देने के लिए कर रहे हैं.
गरीब नहीं, सामान्य वर्ग की 99 फीसदी आबादी को मिलेगा 10 फीसदी आरक्षण!
सिब्बल ने कहा कि देश नई नौकरी नहीं पैदा कर रहा है. इस देश को आरक्षण नहीं नौकरी चाहिए और नौकरी सिर्फ विकास से आएगी. 7.3 फीसदी की दर से ग्रोथ है फिर भी नौकरी नहीं पैदा हो रही है. सीबीआई, ईडी जैसी जांच एजेंसी को सबके पीछे लगा दिया है तो निवेश कौन और कैसे लाएगा. लिहाजा, सरकार बताए कि उनके पास क्या आंकड़ा है. आखिर क्यों सरकार संविधान में ये संशोधन लेकर आई है. सरकार साफ करे कि क्या संविधान में संशोधन करने का यह तरीका सही है? सिब्बल ने कहा कि जब देश में एससी, एसटी और ओबीसी को ही आरक्षण के मुताबिक नौकरी नहीं दी जा पा रही है तो वह अब 10 फीसदी सामान्य क्ष्रेणी को नौकरी देने का ऐलान कर क्या करने जा रही है? सिब्बल ने कहा कि महज संशोधन बिल लाकर मोदी सरकार बेहद खुश हो रही है लेकिन एक सच्चाई से वह मुंह मोड़ रही है कि असली खुशी जनता को मिलनी चाहिए और क्या उनके इस बिल से जनता .
Thursday, January 3, 2019
रात में 2:30 बजे अचानक फट गया फोन, जिंदा जल गया 60 साल का बुजुर्ग; ऐसी गलती न करें आप
राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में फोन के फटने से एक बुजुर्ग की मौत का मामला सामने आया है। दरअसल, जिले के नेतावलगढ़ पाछली गांव के रहने वाले 60 साल के किशोर सिंह रात में मोबाइल फोन रखकर सो रहे थे, लेकिन रात में अचानक फोन की बैटरी फट गई और ब्लास्ट हो गया। ब्लास्ट की वजह से सबसे पहले बुजुर्ग के कपड़ों में आग लगी, जिससे पूरे शरीर में फैल गई, जिससे उनकी मौत हो गई।
कैसे हुआ हादसा?
दरअसल, किशोर सिंह गुरुवार रात को अपने बनियान की जेब में फोन रखकर सो रहे थे। उन्हें ये फोन किसी सरकारी योजना के तहत मिला था। तभी रात के 2:30 बजे अचानक फोन की बैटरी में फट गई और ब्लास्ट हो गया। इससे उनके कपड़ों में आग लग गई और देखते ही देखते उनका शरीर आग में झुलस गया। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन वहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
5 सेफ्टी टिप्स : फोन साथ रखकर न सोएं
फोन को कभी भी तकिए के नीचे रखकर न सोएं, इससे फोन का टेंपरेचर बढ़ जाता है और प्रेशर भी बनता है, जिससे फोन फटने या हीट होने की आशंका बढ़ जाती है।
मोबाइल फोन को कभी भी शर्ट या स्वेटर की ऊपरी जेब में न रखें। इससे न सिर्फ रेडिएशन का खतरा रहता है बल्कि ब्लास्ट होने पर स्वेटर या शर्ट तेजी से आग पकड़ते हैं।
रातभर के लिए कभी भी फोन को चार्जिंग पर न लगाएं, इससे भी फोन के ब्लास्ट होने का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा चार्जिंग के दौरान फोन के आसपास ऐसी चीजें न रखें, जो आसानी से आग पकड़ती हों जैसे- कपड़े या बेडशीट।
कभी भी डुप्लीकेट चार्जर या एडाप्टर का इस्तेमाल न करें। हमेशा ओरिजनल चार्जर से ही फोन को चार्ज करें। इसके अलावा फोन की बैटरी खराब हो गई है, तो ओरिजनल बैटरी का ही इस्तेमाल करें। डुप्लीकेट बैटरी का इस्तेमाल करने से बचें, क्योंकि ये कभी भी फट सकती हैं।
गाड़ी के डैशबोर्ड या ऐसी जगह रखकर कभी चार्ज न करें, जहां सूरज की रोशनी सीधे आती हो। इसके अलावा फोन को हमेशा कवर या केस निकालने के बाद ही चार्जिंग पर लगाएं, ताकि फोन गर्म न हो। अगर फोन जल्दी या ज्यादा गर्म होता है तो उसे सर्विस सेंटर पर दिखाएं।
कैसे हुआ हादसा?
दरअसल, किशोर सिंह गुरुवार रात को अपने बनियान की जेब में फोन रखकर सो रहे थे। उन्हें ये फोन किसी सरकारी योजना के तहत मिला था। तभी रात के 2:30 बजे अचानक फोन की बैटरी में फट गई और ब्लास्ट हो गया। इससे उनके कपड़ों में आग लग गई और देखते ही देखते उनका शरीर आग में झुलस गया। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन वहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
5 सेफ्टी टिप्स : फोन साथ रखकर न सोएं
फोन को कभी भी तकिए के नीचे रखकर न सोएं, इससे फोन का टेंपरेचर बढ़ जाता है और प्रेशर भी बनता है, जिससे फोन फटने या हीट होने की आशंका बढ़ जाती है।
मोबाइल फोन को कभी भी शर्ट या स्वेटर की ऊपरी जेब में न रखें। इससे न सिर्फ रेडिएशन का खतरा रहता है बल्कि ब्लास्ट होने पर स्वेटर या शर्ट तेजी से आग पकड़ते हैं।
रातभर के लिए कभी भी फोन को चार्जिंग पर न लगाएं, इससे भी फोन के ब्लास्ट होने का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा चार्जिंग के दौरान फोन के आसपास ऐसी चीजें न रखें, जो आसानी से आग पकड़ती हों जैसे- कपड़े या बेडशीट।
कभी भी डुप्लीकेट चार्जर या एडाप्टर का इस्तेमाल न करें। हमेशा ओरिजनल चार्जर से ही फोन को चार्ज करें। इसके अलावा फोन की बैटरी खराब हो गई है, तो ओरिजनल बैटरी का ही इस्तेमाल करें। डुप्लीकेट बैटरी का इस्तेमाल करने से बचें, क्योंकि ये कभी भी फट सकती हैं।
गाड़ी के डैशबोर्ड या ऐसी जगह रखकर कभी चार्ज न करें, जहां सूरज की रोशनी सीधे आती हो। इसके अलावा फोन को हमेशा कवर या केस निकालने के बाद ही चार्जिंग पर लगाएं, ताकि फोन गर्म न हो। अगर फोन जल्दी या ज्यादा गर्म होता है तो उसे सर्विस सेंटर पर दिखाएं।
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